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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 9

May 19, 2013

पापड़ और जलेबी 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

होटल में तीन दिन रुकने के बाद हम नए अपार्टमेंट में गए।। सामान पहुंचाते–पहुंचाते रात के एक बज गए। अपार्टमेंट में पार्किंग आरक्षित थी। मेरे पार्किंग लॉट में न जाने किस खबीस के बच्चे ने अपनी कार खड़ी कर रखी थी। मैने कुछ देर के लिए एक आरक्षित किंतु खाली पार्किंग लॉट हथिया लिया। अपार्टमेंट में समान रख कर वापस जा रहा था कि एक वृद्ध सज्जन अवतरित हुए। सीधे सवाल दागा कि क्या यह करोला तुम्हारी है। मैने बड़ी जल्दबाज़ी में लापरवाही से जवाब दिया कि मेरे पार्किंग लॉट में किसी ने हथिया रखा है अतः मैने दूसरे पार्किंग लॉट का प्रयोग कर लिया। वृद्ध सज्जन का अगला बाउंसर था, आपका पार्किंग लॉट हथिया लिया गया हो तो इसका यह मतलब नहीं कि आप भी किसी का पार्किंग लॉट हथिया लें। आप गेस्ट लॉट का प्रयोग कर सकते थे। जवाब बिलकुल वाजिब था। चांदनी रात में हैलोजेन की दूधिया रौशनी में भी मैं वृद्ध सज्जन के तमतमाए चेहरे की लाली देख सकता था। मैने सफाई दी कि जनाब कुछ देर के लिए सामान उतारने तक आपका लॉट प्रयोग किया था, मैं अभी ख़ाली करता हूं। लेकिन वे भद्र पुरुष 'कल से ध्यान रखना' की हिदायत देते हुए ओझल हो गए। बात आई गई हो गई।


डलास की धूप देखकर मेरी मेमसाहब की बांछें खिल गयीं। पूरे दो साल बाद पापड़ बनाने का स्वर्णिम अवसर जो उनके हाथ लगा था। शाम को आफिस से वापस आया तो डलास की धूप में सूखे पापड़ चाय के साथ हाज़िर थे। एक मज़ेदार प्रहसन हो गया उसके बाद। मेमसाहब ने बताया पापड़ बनाते समय नीचे की मंज़िल पर रहने वाला कोई अमरीकी उनका दोस्त बन गया है। अधेड़ उम्र का व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है और भारतीय भोजन का शौकीन है। उसने मेमसाहब को पापड़ बनाते देखकर पूछा होगा कि तुम क्या कर रही हो। मेमसाहब ने उसे पापड़ पुराण सुना दिया। बंदा पापड़ प्रेमी निकला। उसने मेमसाहब को आसपास के सारे भारतीय रेस्टोरेन्ट के नाम गिना डाले। साथ ही उन्हें यह भी सलाह दे डाली कि चूंकि तुम लोग नए हो अतः मैं तुम्हारे शौहर को आसपास की सभी ज़रूरी चीज़े पते ठिकाने बता दूंगा। हांलांकि उसने यह भी स्वीकार किया कि भारतीयों को यहां अपने सामाजिक कौशल के चलते स्थापित होने में ज्यादा कष्ट नहीं उठाना पड़ता। मेमसाहब ने घोषणा की कि छोले भटूरे बने हैं और मैं उनके नए दोस्त को भी कुछ छोले भटूरे दे आऊं। इसी बहाने किसी काम के आदमी से जान पहचान हो जाएगी। मेरे यह कहने पर कि यहां के लोग ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं करते मेमसाहब ने उनके मिलनसार एकाकी और अधेड़ होने की दुहाई दे डाली।


मैं तब भी अड़ा था कि यहां के लोग शायद ही हमारी तरह ताउम्र विवाहित रहते हैं। असुविधा की वजह से बच्चे न पाल कर कुत्ते बिल्ली पालते हैं और परिवार की जगह कार और मकान जैसी बेजान चीजा पर ज्यादा समय व ध्यान देते हैं। इसी वजह से अकेले रहते–रहते खड़ूस हो जाते हैं, पर मेरी संवेदनशील पत्नी अगर किसी का भला करने पर अड़ जाए तो सारे तर्क कुतर्क व्यर्थ हैं। वह सामाजिकता, संवेदनशीलता और धार्मिक परमार्थ आदि के इतने तर्क प्रस्तुत करेंगी कि उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। झख मार कर मैं छोले भटूरे की प्लेट लेकर नीचे वाले अपार्टमेंट में गया और घंटी बजाई। अपने इस नए पड़ोसी से मैने बताया कि मैं उनकी नयी पड़ोसन का पति हूं और उनके लिए मेरी पत्नी ने छोले भटूरे भेजे हैं। पड़ोसी ने मुझे अंदर आमंत्रित किया रोशनी में मेरे दीदार होते ही वे बोले, "मैं तुम्हें पहचानता हूं। हमारा पार्किंग लॉट में विवाद हो गया था पर अब उसे भूल जाओ।" जनाब का नाम बॉब था और वे फोर्ड कार की डीलरशिप में कार्यरत थे।


बॉब को भारतीय भोजन चटपटा होने की वजह से बहुत पसंद था। मुझे उसने एक पेंटिंग दिखाई जिसमें विश्व की सभी प्रकार की मिर्चों के चित्र थे। कुल छप्पन प्रकार की मिर्चों में वह बीस तरह की मिर्चें चख चुका था। बॉब पार्किंग लॉट वाला मामला जल्द ही भूल गया। उसने मुझे एक और तस्वीर दिखा कर उसमें से एक महिला को पहचानने को कहा। यह महिला और कोई नहीं बीस तीस महिलाओं के शिष्ट मंडल से घिरी स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी थीं। उस शिष्ट मंडल में बॉब की दादी भी शामिल थीं। बॉब ने बताया कि वह भारत घूमने जाना चाहता है। उसके पहले वह तैयारी कर रहा है और भारत के बारे में जो कुछ उसे मिला सब पढ़ चुका है।


एक दिन रविवार की सुबह बॉब आवाज़ लगा कर बुलाने लगा। पता चला जनाब अपने पिछवाड़े बार्बेक्यू स्टेक यानि कि भैंसे का मांस पका रहे थे। बोले कि तुम अक्सर भारतीय खाना खिलाते हो आज तुम्हें टेक्सास स्पेशल खिलाता हूं। यह पता चलने पर कि हम शाकाहारी हैं बेचारा बहुत निराश हुआ पर थोड़ी ही देर में कहीं से मैक्सिकन डिश लेकर हाज़िर हो गया। कभी कभी यह देख कर ताज्जुब होता है टेक्सास की बगल में बसे देश मैक्सिको निवासियों की शक्ल सूरत भारतीयों से इस कदर मिलती है कि धोखा हो जाता है।


जलेबी का जलवा


एक दिन शाम को आफिस से घर पहुंचा तो श्रीमती जी हांथ पर पड़ोसन से बरनॉल लगवा रही थीं। पता चला महिला मंडल में पकवान चर्चा के बीच जलेबी का ज़िक्र आगया। सबको एक ही कोफ्त थी कि डलास में सब मिलता है पर किसी को जलेबी नहीं दिखी। एक दक्षिण भारतीय पड़ोसन तो कभी जलेबी नाम की चीज़ से रूबरू ही नहीं हुई थी। मेरी पाक कला सिद्धस्त श्रीमती जी मोर्चे पर कूद पड़ीं। आखिर कानपुर और जलेबी की प्रतिष्ठा का प्रश्न था पर आपाधापी में गर्म तेल मैडम के हाथ पर छलक गया। उनकी प्राथमिक चिकित्सा के बीच मेरा पदार्पण हुआ। फौरन एक 'वॉकइन क्लीनिक' ले गया। डाक्टर ने मरहम पट्टी तो कर दी पर उसे यह चोट कुकिंग में लगी है यह हजम नहीं हो रहा था। वह शंकित था कि कहीं चोट की वजह मियां बीवी में हाथापाई तो नहीं। अब शक की दवा तो हकी लुक्मान के पास भी नहीं थी। पर बुढऊ डाक्टर कुछ देर में समझ गया कि इस दुर्घटना के पहले हम दोनों में सिर फुटव्वल जैसा कुछ नहीं हुआ।

 

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