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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 4

May 14, 2013

अथ भोजन व्यथा कथा  

 

अगर हमने महेश भाई को झेला तो मेरे मित्र नवीन, नीरज जी व सोलंकी सुरेश भाई से त्रस्त रहे। सप्ताहांत पर नवीन भाई मुझे गेस्ट हाउस बुला लाए। भोजन के दौरान सोलंकी जी ने 'अथ श्री सुरेशानंद व्यथा कथा' छेड़ दी। पता नहीं क्यों कंपनी वालों ने मेरे मित्र के साथ एक मियां बीवी को भी गेस्ट हाउस में टिका दिया था। वैसे सुरेश की बीबी मेरे मित्रों का भी भोजन सस्नेह बना देती थी। वह जितनी भली स्त्री थी सुरेश भइया उतने ही अझेल प्राणी थे। पहले तीन दिन तक तो सारे मित्र उनके श्रीमुख से सिंगापुर एअरपोर्ट के मुकाबले अटलांटा एअरपोर्ट के घटिया होने का प्रलाप सुन–सुन कर त्रस्त हुए। वजह सिर्फ़ एक थी कि माननीय सुरेश जी को अटलांटा एअरपोर्ट में सामान रखने की ट्राली का एक डालर किराया देना खल रहा था जो सिंगापुर एअरपोर्ट में नहीं देना पड़ताा था। उसके बाद सुरेश भाई का सिंगापुर स्तुतिगान, जहां से सुरेश भाई अवतरित हुए थे और अमेरिका का नित्य निंदापुराण मेरे तीनों मित्रों की नियति बन गया। सुरेश भाई द्वारा कंपनी आफ़िस में इकलौते इंटरनेट टर्मिनल पर सारे दिन का कब्ज़ा जमाए रखना एवं गेस्ट हाउस में नाहक धौंसबाजी मेरे मित्रों के सब्र के पैमाने से परे जा चुकी थी।


तीनों मित्र गेस्ट हाउस में ऑमलेट नहीं खा सकते थे क्यों कि सुरेश भाई को अंडे की बदबू नहीं पसंद थी। रात में आठ के बाद टीवी चलाने से सुरेश भाई की नींद में खलल पड़ता था। बेचारे मित्र प्रतिदिन डिब्बाबंद खाने की जगह मिलने वाले ताज़े खाने की वजह से सुरेश भाई को "पैकेज डील" की तरह बर्दाश्त कर रहे थे। बातचीत में पता चला कि वस्तुतः यह सुरेश, महेश के सगे भाई भी थे, जिन्हें मैंने झेला था। जब मैंने उनको बर्तन रखने की अलमारी का किस्सा सुनाया तब सबको दोनों भाइयों के व्यवहारिक धरातल का सहज अनुमान हो गया उस समय दोनों भाई कहीं गए हुए थे। महेश सवेरे नीरज जी को जाने क्या अनुचित बोल गया कि अगर सुरेश की बीवी का लिहाज़ न होता तो नीरज जी व सोलंकी महेश भाई की धुलाई कर डालते।


मुझे शाम को आमलेट बनाने की सूझी। सोलंकी जी ने टोका भी कि सुरेश सपरिवार आ रहा होगा। मैंने कहा,
"ठीक, मैं भी महात्मा के दर्शन कर लूंगा। पर आमलेट ज़रूर बनाऊंगा।"


मित्रगण मेरे स्वभाव से कालेज के ज़माने से परिचित थे अतः थोड़ी देर में होने वाले प्रहसन के इंतज़ार में टीवी लगाकर बैठ गए। आमलेट बनने के धुएं के बीच सुरेश जी अवतरित हुए व सीधे सपत्नीक कमरे में चले गए। कुछ ही देर में बाहर आकर कुकुरनासिका का प्रदर्शन करते हुए जिज्ञासा प्रकट की कि किसी ने आमलेट बनाया था क्या। मैं बोला,
"हां मैं बना रहा हूं।"


सुरेश जी कुछ भृकुटी तान कर बोले पर इस बर्तन में तो शाकाहारी खाना बनता है। मैंने पूरी कानपुरिया दबंगता से जवाब दिया, "अरे आपको महेश ने नहीं बताया कि चीनी डांग तो इसी बर्तन में बीफ गाय का मांस बनाता था, जिसे महेश बाद में धोकर टमाटर चावल की लुगदी पकाने के लिए प्रयोग करता था . . .सुरेश जी इससे पहले कुछ और सोचें मैं चालू रहा, "और अभी आप सब रेस्टोरेन्ट में खाकर आ रहे हैं वहां कौन सा शाकाहारी भोजन बनाने से पहले बर्तनों का धार्मिक शुद्धीकरण होता है।" सुरेश जी अवाक रह गए।


महेश उन्हें और ज़लील होने से बचाने के लिए कमरे में खींच कर ले गया। मित्र मंडली की हंसी बमुश्किल ही रुक पाई। दोनों भाइयों में शायद पहले डांग को लेकर जमकर नोक झोंक हुई कि न जाने फिर क्या सूझी कि दोनो भाई सुरेश की पत्नी को उसके सामान सहित कहीं छोड़ने चले गए। नवीन भाई इस प्रकरण में सुरेश की पत्नी के जाने से कुछ दुखी थे। उनको फिर से डिब्बा बंद खाने पर जीना अप्रिय लग रहा था। पर बाकी सब इसलिए प्रसन्न थे कि अब सुरेश तो निहत्था गेस्ट हाउस लौटने वाला था। अब तो हमाम में सभी नंगे हैं जो जिस पर जैसे चाहे रौब जमाए।


हुआ भी वही। एक सप्ताह में सुरेश भाई मेरे मित्रों के बदले हुए वाचाल वानरी रूप के आगे नतमस्तक हो गए। उन्हें अहसास हो गया कि गेस्ट हाउस में जब तक उनकी पत्नी थी वहां शराफ़त थी। उसकी बीवी के लिहाज़ से सब उन्हें चाहे अनचाहे सम्मान देने को और उनके नाज़ सहने को विवश थे, पर बेचारा अपनी पत्नी को गेस्टहाउस से भेजकर वानर सेना के हत्थे चढ़ गया और वह भी बिना ढाल के। सबने उसे बेतरह परेशान किया। रात–रात भर टीवी चला कर, जम कर निरामिष भोजन बना कर। यहां तक कि जब सबका एक साथ प्रोजेक्ट लगा तो सबने सुरेश को एक हफ्ते पुराने हिसाब के 15 डॉलर जानबूझ कर एक एक सेंट के सिक्कों की शक्ल में थमा दिए। लेकिन कृपणचंद तीन किलो भारी चिल्लर का थैला लादे लादे एअरपोर्ट चला गया।

 

मोनिका को गुस्सा क्यों आया?

 

यह घटना किसी चुटकुले से कम नहीं है। घटना की संवेदनशीलता को मद्देनज़र रखते हुए मैंने इसके दो पात्रों तीसरी पात्रा से अब संपर्क नहीं है से इसे अपनी किताब में शामिल करने की पूर्वानुमति ले ली है। बात मेरे पहली कार ख़रीद लेने के बाद की है पर हमारे कंपनी गेस्ट हाऊस से जुड़े होने के कारण इसका ज़िक्र इस अध्याय में ही उचित होगा। मेरे इंजिनीयरिंग कॉलेज में साथ पढ़े पांच छः मित्र तीन महीनों के अंतराल पर हमारी कंपनी में ही नियुक्त होकर अमेरिका आए। कंपनी के गेस्ट हाउस का फ़ोन नंबर, इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़े अमेरिका में मौजूद तकरीबन सभी मित्रों को पता था। प्रायः सभी मित्र नए आने वाले दोस्तों को फ़ोन लगाकर उनके हालचाल पूछ लेते थे और ज़रूरी सलाह मशविरा भी दे देते थे। मैं चूंकि अटलांटा में प्रोजेक्ट पर कार्यरत था अतः गेस्ट हाउस में आने वाले मित्रों से आसानी से मिल सकता था।

एक बार मेरे से एक साल वरिष्ठ सहपाठी श्रीमान सोती जी गेस्ट हाऊस में पधारे। सोती जी बहुत ही विनम्र स्वभाव के मित्र हैं। उस सप्ताहांत पर मैं गेस्ट हाऊस गया और उन्हें लेकर अपनी कार से अटलांटा भ्रमण पर निकल गया। उसी सप्ताह गेस्ट हाउस में दो और नए प्राणी आए थे, एक बंदा जिसका मुझे नाम याद नहीं और एक बंदी मोनिका। उन दोनों से हम लोगों ने जाते हुए पूछ लिया था कि उन्हें इंडियन ग्रोसरी से कुछ मंगाना तो नहीं। शाम को मैंने सोती जी को गेस्ट हाउस वापस छोड़ा और अपने अपार्टमेंट को चल दिया। मेरे रूम पार्टनर सत्यनारायण स्वामी ने बताया कि मेरे लिए किन्हीं गोस्वामी का फ़ोन था। गोस्वामी जी भी मेरे वरिष्ठ सहपाठी है और श्रीमान सोती के बैचमेट हैं। गोस्वामी जी बहुत ही मिलनसार एवं विनोदी स्वभाव के हैं। गोस्वामी जी से हुआ वार्तालाप प्रस्तुत है–
मैं : गुरूजी, नमस्कार।
गोस्वामी जी : नमस्कार प्रभू, क्या गुरू खुद भी घूमते रहते हो और हमारे सोती जी को भी आवारागर्दी की आदत डलवा रहे हो।
मैं : अरे गोस्वामी जी सरकार, अब अपने मित्र भारत से नए नए आते हैं, पास में कार तो होती नहीं, तो थोड़ी सेवा ही सही। सोती जी को शापिंग कराने ले गया था।
गोस्वामी जी : अच्छा अच्छा। यार पर एक बात बता, गेस्ट हाउस में भाभीजी भी साथ आई है क्या? और क्या भाभी बहुत तेजतर्राट है या आज उनका सोती से सवेरे सवेरे झगड़ा हुआ था?
मैं : भाभीजी? तेजतर्राट? अरे गुरूदेव, सोती साहब तो अकेले आए हैं, भाभी बाद में आएंगी। आपको किसने कह दिया कि उनका कोई झगड़ा हुआ है?
गोस्वामी जी : यार लगता है कुछ लोचा हो गया है। कुछ समझ नहीं आ रहा। मैंने सवेरे गेस्ट हाउस सोती को फोन लगाया था। सोती तो मिला नहीं, फ़ोन पर किसी महिला की आवाज़ आई। मैं समझा कि शायद सोती भारत से भाभीजी को साथ लाया है। मैंने नमस्ते की और बताया कि गेस्ट हाउस का नंबर मैंने तुझसे लिया है।
मैं : फिर?
गोस्वामी जी : मैंने उन मोहतरमा से पूछा कि "सोती किधर है?" पर इतना पूछते ही वह भड़क गई, कहने लगी कि आपको तमीज़ नहीं है। आप महिलाओं से उलजलूल सवाल पूछते हैं, आपको शर्म आनी चाहिए। यह कहकर उन मोहतरमा ने फ़ोन ही पटक दिया। अब यार तू ही बता, मैंनें कौन सा ऊलजलूल सवाल पूछा?
मैं भी पशोपेश में पड़ गया कि गोस्वामी जी से ऐसी कौन सी खता हो गई जो मोनिका जी क्रुद्ध हो गईं। चूंकि मोेनिका जी अगले ही दिन किसी दूसरे प्रांत चली गई, अतः उनसे संपर्क नहीं हो सका। हालांकि बाद में जब यह वृतांत अन्य मित्रों को बताया गया तो वह सब के सब हंस–हंस के दोहरे हो गए। उनके जवाब "जाकी रही भावना जैसी, प्रश्न का अर्थ समझे तिन तैसी" ने गुत्थी सुलझा दी। अफ़सोस कि मोनिका जी को हम यह स्पष्टीकरण नहीं दे सके। यदि आपको मोनिका जी कहीं मिले तो आप उन्हें बता दीजिएगा कि गोस्वामी जी ने तो उनसे सिर्फ़ अपने मित्र सोती जी का ठिकाना पूछा था।

 

 

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