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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 15

 अमेरिका वापसी और हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण  

 

 भारत से  वापसी हुई तो डलास से भी रुख़सत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फ़िलाडेल्फ़िया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका के दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ़ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था। वैसे यह डर बेबुनियाद भी नहीं था। सत्यनारायण अपने बर्फ़ पर कार फिसलने से हुई दुर्घटना और बर्फ़ीले मौसम की मुश्किलों के हाल बता चुके थे। इस बार लेकिन कोई विकल्प नहीं था। दिसंबर का मौसम था और डलास से फ़िलाडेल्फ़िया, सौलह सौ मील लंबा ड्राइव करना संभव नहीं था। इसलिए हवाई यात्रा करते हुए फ़िलाडेल्फ़िया का रुख़ किया। फ़िलाडेल्फ़िया में एक छोटे से उपशहर, जिसे हम यहां सबर्ब कहते हैं, में काम करना और रहना था। जगह का नाम सुन कर विचित्र लगा 'किंग आफ प्रशिया'। हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी से पूछा भी कि यह किंग आफ प्रशिया का नाम किस किंग पर पड़ा पर सभी निरुत्तर थे। इतिहास खंगालने पर भी यही पता चला कि 1851 में किसी सर्वेक्षणकर्ता ने किसी होटल पर किंग आफ प्रशिया लिखा देख कर पूरे कस्बे का नाम यही समझ लिया, अब वह होटल वाला खुद किंग था या प्रशिया से आया था, खुदा जाने।


बांके बिहारी


किंग आफ प्रशिया में आने पर पता चला कि हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण होने जा रहा है। इसमें एक अमेरिकी शामिल हो जाएगा। इस नए मेहमान के आने की तैयारियां शुरू हो गई। एक ऐसे ही शनिवार को नए अमेरिकी के संभावित नाम पर विचार विमर्श चल रहा था। आजकल बच्चों के इतने क्लिष्ट नाम रखे जा रहे हैं जिनको अंग्रेज़ी में 'टांग ट्विस्टर्स' की संज्ञा दी जा सकती है। उस पर तुर्रा यह कि कभी–कभी खुद मां बाप को पता नही होता कि नाम का मतलब क्या है। फिर कई बार एक देश में रखा नाम दूसरे देश में मुसीबत बन जाता है। कुछ अक्षरों का तो अमेरिकन अंग्रेज़ी में वजूद ही नहीं। खुद मेरे नाम में आने वाला 'त' कभी ड कभी ट बना डालते हैं यहां लोग।

हालांकि मेरे एक मित्र वाजिद की तो शामत ही आ गई थी। बेचारे ने बड़े अरमान से अपने जिगर के टुकड़े का नाम फख्र रख दिया। पर हर मेहमान, हर रिश्तेदार उनकी बुद्धि पर तरस खाते हुए उन्हें बच्चे का नाम बदलने की सलाह देने लगा। वाजिद भाई भी अपनी पसंद पर अड़े रहे। पर बच्चे ने स्कूल जाना शुरू करने और समझदार हो जाने पर गदर काट दी कि या तो हमारा नाम बदलो या हमारा स्कूल। देर से ही सही वाजिद भाई को बात समझ में आ गई और तमाम अदालती सरकारी खर्चों के बाद फख्र मियां सलीम बन गए। कुछ ऐसे ही संस्कृति के कीडे. ने हमें काटा और हमें सूझा कि अगर हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो हम उसका नाम बांके बिहारी रखेंगे। न जाने क्यों श्रीमती जी को यह नागवार गुज़रा। उनको केशव–ए–माधव वगैरह नाम पुरातन पंथी लग रहे थे जबकि बांके नाम से गुंडेपन का अहसास हो रहा था। इस मुद्दे पर गंभीर मतभेद हो गए।


बच्चों की बरसात


नए मेहमान के लिए हम सपरिवार 'टवायस आर अस' गए। यहां नवजात शिशुओं के लिए एक सेक्शन ही अलग बना होता है। वहां हमारे सरीखे. कई परिवार ख़रीदारी में लगे थे। ऐसी–ऐसी चीज़ें जो कभी न देखी न सुनी। हमें किंकर्तव्यविमूढ़ देख एक सहायिका ने पूछा कि क्या हम बेबीशावर की योजना बना रहे हैं। इस सवाल पर हम से ज़्यादा हमारी बेटी चकित थी कि भला बच्चों की बरसात कैसे हो सकती है और अगर बच्चे बरसने लगे तो कैसा नज़ारा होगा। इस नए शब्द का मतलब भी जल्द समझ में आ गया, 'बेबी शावर' बहुत कुछ उत्तर भारत में होने वाली गोद भराई की रस्म जैसा उत्सव होता है।

पर यहां आपके घर अनचाहे या एक सरीखे दो तीन उपहार न आ जाए इसके लिए आप अपनी पसंद के किसी स्टोर में अपनी मरज़ी की उपहार सूची चुन कर उसे अपने मित्रों या रिश्तेदारों में ईमेल से वितरित कर देते हैं। लोग उसमें से अपनी पसंद या सामथ्र्य के हिसाब से चुनाव करके भुगतान कर देते हैं और उत्सव वाले दिन सारे सामान आपके घर एकसाथ पहुंच जाते हैं। कुछ ऐसा ही शादी विवाह में भी होता है। अगर ऐसा भारत में भी होता तो हर नवविवाहित को छः घड़ियां, तीन आइसक्रीम सेट, बारह लंचबाक्स और बत्तीस थर्मसों का संग्रहालय न बनाना पड़े।

बताओ डाक्टर ने क्या बताया?


कुछ सप्ताह बाद श्रीमती जी का स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान अल्ट्रासाउंड हो रहा था। अमेरिका में बेटे या बेटियों को लेकर मुझे कोई पूर्वाग्रह नही दिखा। हालांकि अल्ट्रासाउंड में नर्स होने वाले बच्चे का लिंग बता सकती है पर बहुत से दंपत्ति इसे अंत तक नहीं जानना चाहते। बच्चे के मामले में कई विशेषाधिकार मां को प्रदत्त हैं। यही अल्ट्रासाउंड में हुआ, नर्स ने श्रीमती जी से पूछा कि क्या वे जानना चाहेंगी कि होने वाले बच्चे का लिंग क्या है। मारे रोमांच के श्रीमती जी ने नहीं में गर्दन हिला दी। नर्स ने यह जानना चाहा कि क्या वे इस सूचना के अधिकार से मुझे भी वंचित रखना चाहेंगीं। पता नहीं क्यों उन्होने नहीं कर दी। फिर क्या था, नर्स ने श्रीमती जी की आंखे ढंक कर मुझे इशारे से बता दिया कि अस्पताल से बाहर आते ही श्रीमती जी का प्रश्न था, "बताओ डाक्टर ने क्या बताया?" मंैने चहुलबाजी में बहाना टिका दिया कि आप तो रोमांच को रोमांच ही रखना चाहती है अतः इसे रहस्य ही रहने दें। पर उनके पास ब्रह्मास्त्र मौजूद था। उन्होंने दांव फेंका कि चूंकि अमेरिका में हमारे रिश्तेदार वगैरह न होने कि वजह से सारी ख़रीदारी हमें ही करनी होगी और वह भी शिशुआगमन से पहले इसलिए मुझे या तो उन्हें सच बता देना चाहिए या फिर दोहरी ख़रीदारी के लिए तैयार रहना चाहिए।

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