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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US

May 12, 2013

Getting a H-B1 Visa to USA is every Indian software engineer's dream .What changes happen to the lifestyle of an ordinary computer engineer from a non-metro city , after getting a H-B1 Visa to USA is mostly heard from others. Let me present here the memoirs of one such engineer in first person . It is hillarious as well as knowledge enhancing account of the things in store , for those who dream  this Visa....

 

 अथ कंप्यूटर इंजीनियर अमेरिका  कथा - 1 (प्रयाण)

 

अपने कैरियर के तीन साल लखनऊ कानपुर में खर्च करने के बाद एक दिन मुझे भी यह ब्रह्मज्ञान हो गया कि उत्तर प्रदेश में इन्फॉरमेशन टेक्नोलाजी की क्रांति शायद मेरी जवानी में आने से रही और सरकार सूचना क्रांति के नाम पर हर शहर में टेक्नोलाजी पार्क बनाकर ठोंकती रहेगी सरकारी बाबुओं के पीकदान बनने के लिए, अतः भला इसी में है कि हम भी हवा के रुख़ के साथ अमेरिका के लिए बोरिया बिस्तर बांध लें।
ख़ैर कुछ महीने तक अपनी कर्मकुंडली यानि बायोडेटा को कम से कम एक हज़ार नियोक्ताओं के पास भेजने के बाद यह तक भूल गया कि किस किस के पास भेजा था। सोचा कि दिल बहलाने को ग़ालिब ख्.याल अच्छा है, हम तो ख़ाक छाने कानपुर की और हमारी कर्मकुंडली इंटरनेट की बदौलत दुनिया की मुफ़्त सैर कर रही है। ख़ैर कर्मकुंडली को कुछ लोगों ने पसंद भी किया और कुछ टेलीफोन काल्स भी आईं, ऐसे ही एक दिन फोन रिसीव करने पर उधर से शालीन आवाज़ आई,
"अतुल, मैं नीरज बोल रहा हूं.। आपका बायोडेटा देखा। उसी सिलसिले में आपके अब तक किए गए काम के बारे में बात करना चाहता हूं।"
कुल पांच मिनट की संक्षिप्त बातचीत हुई और जनाब ने यक्ष प्रश्न पूछ डाला,
"हां कहने के क्या लोगे?"
मैं पशोपेश में था कि नीरज साहब रहते किस शहर में हैं, दिल्ली या बम्बई तो फिर उसी हिसाब से मुंह खोलूं। खैर कूटनीतिक जवाब दिया " नीरज जी, यह बहुत कुछ मेरे नियुक्ति स्थल पर निर्भर करता है।"
नीरज जी ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया "नियुक्ति स्थल से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता। हां वेस्ट कोस्ट हो तो बात अलग है।"
मेरे मन की एक साथ कई घंटियां बज गईं "क्या वेस्ट कोस्ट, यानि कि अमेरिका, यानि कि जवाब डॉलर में देना चाहिए, यानि कि . . ."।
ख़ैर नीरज जी ने जो ऑफर दिया वह मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। नीरज ने अगले दिन ईमेल भेजने की बात कही और अगले दिन टेक्निकल ईंटरव्यू करने का ज़िक्र किया, पर अगले दिन मेरे ईमेल इनबाक्स पर ऑफर लेटर विराजमान था, और दो दिन में ही एक कोरियर असली पत्र कुछ हिदायतों के साथ जिनमें पासपोर्ट के कुछ पन्ने भी मांगे गए थे। इस पांच मिनट की कॉल ने, कनपुरिया भाषा में बवाल मचा दिया। अब कानपुर की आबोहवा छूटने का समय आ गया था। ज़िंदगी ने 180 डिग्री का मोड़ ले लिया था। एक अनजानी दुनिया में पैर टिकाने की तैयारियां करनी थी।

क्या छोड़े क्या ले चलें 


पहले कुछ दिन बड़ी दुविधा में बीते। अगर आप में से कोई पहली बार अमेरिका आ रहा है तो यह प्रसंग आपके काम का हो सकता है। आपको ऐसे–ऐसे विशेषज्ञ मिल जाएंगे कि जिन्होंने खुद तो अपने शहर के बाहर ताउम्र पांव भी नहीं रखा होगा पर आपको अमेरिका में किस चीज़ की ज़रूरत पड़ती है, क्या मिलता है, क्या भारत से लाना पड़ता है यह सब बताने को तत्पर रहेंगे। यह और बात है कि इन सबकी सलाह परस्पर विरोधी होंगी और अंततः आप लालू यादव की भाषा में कन्फ्युजिया जाएंगे। एक ऐसे ही अंकल मुझे एक दिन अलग कमरे में ले जाकर चिंतातुर हो रहे थे कि यार तुम शराब को हाथ भी नहीं लगाते तो अटलांटा जैसी ठंडी जगह में ज़िंदा कैसे रहोगे। अब अटलांटा तो ख़ास ठंडा नहीं था पर मैं तो उन्हें बताना चाहता हूं कि चार साल से फिलाडेल्फिया जैसी जगह जहां बर्फ़ भी पड़ती है वहां मेरे जैसे कई भलेमानुष बिना सुरासेवन के ज़िंदा हैं। कोई वहां कढ़ाई ले जाने पर ज़ोर दे रहा था तो कोई रज़ाई। भला हो अमेरिका में पहले से रह रहे मित्रों का जिन्होंने वक्त पर सही मार्गदर्शन कर दिया। यहां सब कुछ मिलता है। घर को गरम रखने का इंतज़ाम होता हैं अतः रजाई कोई नहीं ओढ़ता। मेरे एक मित्र को ऐसे ही विशेषज्ञों ने रज़ाई, कढ़ाई और न जाने क्या माल असबाब लाद कर ले जाने पर मज़बूर कर दिया था। बेचारा एअरपोर्ट पर फौजी स्टाईल के बिस्तरबंद के साथ कार्टून नज़र आ रहा था।


मेरे जीजा भी कैलीफोर्निया में रहते हैं

 

अमेरिका जाने पहले सभी नाते रिश्तेदारों से एक बार मिलने के सिलसिले में बड़ा मज़ेदार अनुभव हुआ। ज़्यादातर दूर के रिश्तेदारों के न जाने कहां से अमेरिका में संबंधी उग आए। अपने निकट का तो ख़ैर कोई भी भारत से तो क्या उत्तर प्रदेश से भी बाहर मुश्किल से ही गया होगा। अब इन दूर के रिश्तेदारों और जानपहचान वालों ने अपने अमेरिकी रिश्तदारों के नंबर भी देने शुरू कर दिए, इसके लिए मुझे साथ में हमेशा एक डायरी रखनी पड़ती थी। सोचता था कि कभी तथाकथित अमरीकी रिश्तेदारों को देखा तो है नहीं इन लोगों के यहां, जो रिश्तेदार अमेरिका में रह कर इन पास के रिश्तेदारों को नहीं पूछते वे भला मुझ दूर के रिश्तेदारों को क्यों लिफ्ट देंगे। फिर भी औपचारिकता निर्वाह हेतु नंबर सबके नोट कर लिए।
एक दिन तो हद हो गई। किसी ने सलाह दी कि, कस्टम के नियमानुसार सारे लगेज बैग में चाहे छोटे ही सही ताले लगे होने ज़रूरी हैं। अतः एक परचून वाले की दुकान जाकर सबसे सस्ते ताले मांगे। परचून वाले ने ताले देते हुए पूछ लिया कि "साहब थोड़े मज़बूत वाले ले लो, यह तो कोई भी तोड़ देगा।" मैंने जब हल्के ताले पर ही ज़ोर दिया तो उसने अगला सवाल उछाला, "क्या प्लेन से कहीं जा रहे हैं? मेरे हां के जवाब में अगला सवाल हाज़िर था कि कहां? मेरे अमेरिका कहते ही वह परचूनिया बोला, "अरे भाई मेरे जीजा भी कैलीफोर्निया में रहते हैं। आप उनका नंबर ज़रूर ले जाओ। शायद काम आ जाएं," और वह जनाब बाकी ग्राहकों को टापता छोड़ डायरी लेने चल दिए। मैं सोच रहा था कि मेरा खानदान अब तक अमेरिकियों से अछूता कैसे रह गया। यहां तो परचूनिए तक के संबंधी अमेरिका में बैठे हैं। चाहे वह इन हिंदुस्तानियों को पूछे न पूछे यह लोग हरेक को उनका नंबर दरियादिली से बांटते रहते हैं।

फन्ने खां मत बनो


शुभचिंतकों की राय थी कि अमेरिका जाने से पहले कार चलाना सीख लेना फ़ायदे में रहेगा। हालांकि वहां कार चलाने का ढंग बिल्कुल अलग है पर कम से कम स्टीयरिंग पकड़ने का शऊर तो होना ही चाहिए। अपने परिवार में किसी ने पिछली सात पुश्तों में भी कार नहीं ख़रीदी है, अतः एक कारड्राइविंग स्कूल में जाकर ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग सेंटर के अनुभव से कह सकता हूं कि ज़्यादातर रईस अपने किसी रिश्तेदार या ड्राइवर से कार चलाना सीखते हैं, इसका मज़ेदार नतीजा बाद में मैंने अमेरिका में देखा। इन ट्रेनिंग स्कूल में आने वाले ज़्यादातर लड़के ड्राइवर की नौकरी करने के लिए सीखने आते हैं। ट्रेनर कोई खान साहब थे। बेचारे लड़के खान साहब से इतनी चपत खाते थे कि पूछिए मत। खान साहब हर ग़लती पर उनके सर के पीछे ज़ोरदार चपत रसीद करते थे इस जुमले के साथ "ससरऊ, कायदे से सीखो वर्ना मालिक दो दिन में निकाल बाहर करेगा।" पर खान साहब ने मुझे कानपुर में ही एक्ज़िट रैंप, हाइवे मर्जिंग वगैरह के बारे में बता दिया था। यह बात दीगर है कि उन्होंने खुद कभी हिंदुस्तान से बाहर कदम नहीं रखा। एक दिन मज़ेदार वाक्या हुआ। मेरी ट्रेनिंग का आख़िरी दिन था। खान साहब ने मुझसे खाली सड़क पर कार तेज स्पीड में चलवा कर देखी और तारीफ़ की कि तेज़ स्पीड में भी कार लहराई नहीं। लौटते समय एक लड़का चला रहा था। बेचारे ने खाली सड़क देख कर जोश में कार कुछ तेज़ भगा दी और तभी उसके सर के पीछे ज़ोर की टीप पड़ी। खान साहब गुर्रा रहे थे, "ज़्यादा फन्ने खां बनने की कोशिश न करो, तुम भी क्या इनके साथ अमेरिका जा रहे हो जो हवा में कार उड़ा रहे हो?"


तुम्हारा एअरकंडीशनर उखड़वा दूं क्या?


विदेश जाने से पहले इन्कमटैक्स क्लीयरेंस लेना था। मेरी पहली कंपनी इन्कमटैक्स के क़ाबिल नहीं थी पर एअरपोर्ट पर इमीग्रेशन काउंटर के यमदूतों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता। इन्कमटैक्स ऑफ़िस से कोई काग़ज़ निकलवाना हो तो कोई न कोई जुगाड़ ज़रूर होना चाहिए। मैं एक इन्कमटैक्स कमिश्नर का सिफ़ारिशी पत्र लेकर पहुंच गया। कानपुर की भाषा में इसे जैक लगाना जैक, जो पंचर कार को ज़मीन से ऊपर उठाने के काम आता हैहृ कहते हैं। कमिश्नर साहब की चिठ्ठी लेकर मैं उस अधिकारी ह्यशायद संपत्ति अधिकारी के पास पहुंचा जिसके पास पूरी इमारत की देखभाल का ज़िम्मा था। उन जनाब ने कमिश्नर साहब की चिठ्ठी एक चपरासी को सुपुर्द की और मुझे उसके साथ भेज दिया हर संबद्ध अधिकारी् लिपिक पर साईन करवाने। एक क्लीयरेंस के लिए इतने सारे अधिकारियों की चिड़िया फार्म पर बैठाने की लालफीताशाही। हर अधिकारी की डेस्क से मेरा निरंकुश फार्म निकल गया पर आख़िर में एक धुरंधर लिपिक टकरा ही गया। चपरासी को दरकिनार कर उसने मुझसे कोई ऐसा फार्म मांग लिया जो मेरे पास नहीं था। घूस खाने के लिए ही इस तरह की ग़ैरज़रूरी शासकीय बाध्यताएं खड़ी की जाती है हमारे समाजवादी दुर्गों में। चपरासी ने उस लिपिक को इशारा किया कि फार्म के साथ कमिश्नर साहब का सिफ़ारिशी जैक लगा है पर वह लिपिक फच्चर लगाने पर तुला रहा। मजबूर होकर चपरासी ने उस लिपिक से कहा, "साहब आप बड़े साहब संपत्ति अधिकारी मिल कर उन्हीं को समझाओ।" लिपिक तैश में आगे–आगे और हम दोनों पीछे से संपत्ति अधिकारी के कमरे में दाखिल हुए। संपत्ति अधिकारी ने प्रश्नवाचक नज़रों से लिपिक की ओर देखा। आगे के संवाद इस प्रसंग का मनोरंजक पटाक्षेप हैं।
संपत्ति अधिकारी : "क्या हुआ?"
लिपिक : "साहब इनके ह्यमेरी तरफ़ इशारा करके फॉर्म में फलाना दस्तावेज़ नहीं लगा है।"
संपत्ति अधिकारी : "तो?"
लिपिक : "साहब वह दस्तावेज़ ज़रूरी है।"
संपत्ति अधिकारी : "कमिश्नर साहब की सिफ़ारिशी चिठ्ठी की भी कुछ इज़्ज़त है कि नहीं?"
लिपिक : "साहब, उनकी चिठ्ठी सिर–माथे पर बरसात में खड़े होकर भी कोई बिना भीगे कैसे जा सकता है?"
इन्कमटैक्स ऑफिस से कोई बिना सुविधाशुल्क दिए कैसे जा सकता है?हृ
संपत्ति अधिकारी : "तुम्हारे कमरे से एअरकंडीशनर उखड़वा दूं क्या?"
लिपिक इस ब्रह्मास्त्र के चलने पर बिना एक शब्द बोले हस्ताक्षर कर दिए। ठंडी हवा का सुख खोने का डर लालफीताशाही अकड़ पर भारी पड़ा।

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