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Poem on Power from Thermal Plants...

July 8, 2013

 

   General public in India is not aware how electrical power reaches them via a complex system, requiring continuous hardwork, dedication and use of sophisticated technology. A power engineer has written a poem on this process for common man . Power plant staff will enjoy it more ....

काला आटा ,  उजली रोटी

 शुरूआत यूं कि खदान खेतों से

वैगन के बोरों में लदकर आया
कोयला ग्राइंडिंग मिल्स में
आटे सा पीसा जाता है ।


फिर उसे तंदूरी बायलर की
अग्नि शय्या पर सींचा जाता है ।
नरम गरम रेफरी सी हवा भी आती है
अग्नि और कोयले
दोनो में कुश्ती कराती है।


चिमनी से निकले
काले सफेद धुंए के रूप में
सीटी जब तब बजाती है।


टयूब्स की हजारों मीटर लंबी
पगडंडियों को लांघता फलांघता
गरम मिजाज पानी
ड्रम के शिखर पर बैठ कर
थोड़ा सा सुस्ता भी नहीं पाता कि
भाप का उजला पंछी बनकर
ताप का पैराशूट लादे
उड़ान पर चला जाता है।


सुरंगमय यात्रा कोसों लंबी है
जब टरबाइन का पड़ाव आता है।
थकान से चकनाचूर
वह फैलकर पसर जाता है
पंखों का सारा बोझ बिखर जाता है।


जो जेनरेटर को घुमाता है
कंडेंसर से सरककर थोड़ी थकान
कूलिंग टावर में आती है
और ठंडी होकर वापस
आकाश में समा जाती है।


इधर जेनरेटर से निकली
उजली ऊर्जा भी कम नहीं है
झट शक्ति का कलेवा बांधे
ट्रांसमिसन लाइनों के पथ पर
सुदूर यात्रा पर निकल जाती है।


राह में मिली
दुखियारी मृतप्राय मोटरों को
सहलाती उनमें चेतना जगाती है।

 

यत्र तत्र जो बल्ब टिमटिमाते हैं 

वे रोशनी की रोटियों से नजर आते हैं
कौन कह सकता है कि
पावरहाउसों के किचन से
जो ये रोटियां आती हैं
वे काले आटे को गूंधकर बनाई जाती हैं।

 

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