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Astrological View of Wealth

July 2, 2013

 बाप बड़ा ना भैय्या , सबसे बड़ा रुपैय्या 

आज का युग आर्थिक युग है जिसमें ज्यादातर मुद्दे पैसे से शुरू होकर पैसे पर ही समाप्त होते हैं . पिछले कई महीनों से मेरे अनेक मित्रों ने अनुरोध किया है कि मैं धन के निवेश पर ज्योतिषीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करूं .

परन्तु धन के निवेश पर चर्चा करने से पहले , ज्योतिष शास्त्र धन के बारे में क्या राय रखता है , यह चर्चा अत्यंत आवश्यक है .आज मैं इस विषय पर कुछ विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ .धन के निवेश से जुड़ा पहलू अगले भाग में प्रस्तुत किया जाएगा .

ज्योतिष कुण्डली में धन भाव

भारतीय ज्योतिष से परिचित लोग यह जानते हैं कि कुंडली के दूसरे भाव को धन भाव कहा जाता है. लेकिन इसी भाव को कुटुम्ब ,वाणी और मृत्यु ( मारक ) भाव भी कहा जाता है. मेरे एक मित्र ने टोका कि यह कैसे संभव है कि धन , कुटुंब , मृत्यु और वाणी जैसे मुद्दे एक साथ जुड़े हों .

मैंने उन्हें उत्तर दिया कि असल में धन भाव की व्याख्या सिर्फ चल संपत्ति के रूप में करने की वजह से यह भ्रम पैदा हुआ है. असलियत में दूसरे भाव का एक ही विषय है : संसाधन , जिसे हम संक्षेप में धन भाव कहते है. मानव जीवन के लिए जिन संसाधनों की अनिवार्य आवश्यकता होती है , वह दूसरे भाव के अंतर्गत आते हैं .

मानव जीवन की शुरुआत से अंत तक सबसे महत्वपूर्ण संसाधन ( Resource ) परिवार होता है। यह आदि मानव युग में , जब धन का अता पता भी नहीं था , तब भी अस्तित्व में था . इस परिवार रूपी संसाधन को चलाए रखने के लिए जिस अन्य संसाधन की आवश्यकता पडी उसे धन कहा गया .

भारतीय दर्शन धन को सजीव व निर्जीव में बांटता है. सजीव धन अपने को स्वयं बढ़ा सकता है जबकि निर्जीव धन को सजीव धन की मदद से ही बढाया जा सकता है. सजीव धन में हमारे सगे सम्बन्धी , मित्र , पड़ोसी ,परिचित आदि आते हैं . इसके अलावा हमारे पालतू पशु व पक्षी भी सजीव धन होते हैं . पेड़ ,पौधे आदि अर्द्ध-सजीव श्रेणी में आते हैं . इन सबको छोड़कर जमीन जायदाद जिसमें चल व अचल दोनों संपत्ति शामिल हैं , वे सब निर्जीव धन में आती हैं .

अब हम समझ सकते हैं कि कुंडली का दूसरा भाव सिर्फ धन भाव न हो कर मूलत: संसाधन भाव है. अब हम इससे जुड़े एक अन्य पहलू पर नज़र डालते हैं . इसी भाव में वाणी भी शामिल है.

वाणी का अर्थ यहाँ पर बोलचाल की भाषा शैली से है. हम सब जानते हैं कि सिर्फ मनुष्यों के पास ही विकसित बोलियाँ और भाषाएँ हैं , जानवरों के पास इनका अभाव है इसलिए धन सिर्फ आदमी के ही पास है. .

आपकी भाषा का आपके पास उपलब्ध संसाधनों से सीधा सम्बन्ध है. ज्यादातर प्रतिष्ठित व्यक्तियों की भाषा बड़ी शालीन व शिष्ट होती है जबकि गरीबों की भाषा ज्यादातर अशिष्ट व अपरिमार्जित होती है. पढ़े लिखे लोगों की भाषा पर पकड अच्छी होती है और वे ज्यादा धन वाली नौकरियाँ व व्यवसाय कर सकते हैं . अगर दो लोग एक सी दुकान में एक सा सामान बेच रहे हों तो लोग शालीनता से पेश आने वाले दुकानदार के यहाँ जाना पसंद करते हैं . और अपनी वाणी के बल पर वह दुकानदार ज्यादा धन व संसाधन अर्जित कर सकता है.

द्रौपदी की कटु वाणी को महाभारत प्रारम्भ होने का एक कारण माना जाता है. अत: संसाधनों ( जिसमें परिवार व धन सब कुछ निहित है) की हानि या लाभ होना बहुत कुछ आपकी वाणी पर भी निर्भर है. ज्यादा भाषाएँ जानने से आप अपने व्यवसाय को और अपने धन को कई गुना बढ़ा सकते हैं .

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि धन , कुटुंब व वाणी परस्पर जुड़े हुए हैं . अब हम इस भाव के मारक होने या मृत्यु से सम्बन्ध को समझते हैं . जैसा कि ऊपर बताया गया है कि संसाधन मानव जीवन के लिए अति आवश्यक हैं . पुन: कुदरत में संसाधन सीमित हैं अत: संसाधन अर्जित करने और उन्हें उपयोग होने तक सुरक्षित रखना आसान नहीं है और इसके लिए भी संसाधन चाहिए . चार्ल्स डार्विन की Survival of Fittest Theory के तहत संसाधन अर्जित करने और सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष होना स्वाभाविक है और संघर्ष में मृत्यु होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.

एक बात और भी ध्यान देने योग्य है. जीवित व अर्द्ध जीवित संसाधनों की प्राकृतिक मृत्यु भी निश्चित है. निर्जीव धन की कीमत हमेशा एक जीवित व्यक्ति के लिए ही होती है. अगर सभी मनुष्यों की एक साथ मृत्यु हो जाए तो विश्व भर के अर्जित साधनों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. इस तरह से मृत्यु या कष्ट होना संसाधन रूपी सिक्के का दूसरा पहलू है.

यहाँ से कुंडली का दूसरा भाव एक गंभीर चेतावनी जारी करता है कि संसाधनों को ज्यादा या जल्दी से जल्दी इकठ्ठा करना मृत्यु या मृत्युतुल्य संकट को आमंत्रण देना है. अगर आप रातों रात बहुत सा धन या संपत्ति पा जाते हैं तो आपको बहुत खुश होने की जगह सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि किसी न किसी रूप में कष्ट रूपी दूसरे पहलू से आपका सामना होना तय है. युद्ध व अपराध द्वारा अर्जित त्वरित धन के साथ मृत्यु अनिवार्य रूप से जुडती है.

बात जब संसाधनों की हो तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि सबसे बड़ा संसाधन (Resource or asset ) क्या है ? इसका उत्तर सरल है : मानव शरीर से बड़ा संसाधन कोई नहीं है. संसाधनों का वरीयता क्रम निम्नवत है :

सजीव धन

प्रथम श्रेणी

१. हमारा शरीर २. हमारा परिवार ( माता ,पिता , पति ,पत्नी ,संतान ,भाई , बहन ) ३. सगे संबंधी व अभिन्न मित्र , गुरु आदि .

द्वितीय श्रेणी

१. पालतू जानवर जैसे कुत्ता २. दुधारू जानवर ३. सवारी वाले जानवर जैसे बैल ,घोड़ा ४. अन्य

अर्द्ध सजीव धन

१. फल दार पेड़ पौधे २. इमारती लकड़ी वाले पेड़ ३. अन्य पेड़ व फसलें

निर्जीव धन

प्रथम श्रेणी

१. घर २. जल स्रोत जैसे नदी ,झील कुआं ३. उपजाऊ जमीन ४. खदान ५. जंगल ६. पहाड़ ७. समुद्र तट

द्वितीय श्रेणी

१. धातुएं ( लोहा ,सोना,चांदी ,ताम्बा आदि) २. रत्न ३. सरकारी मुद्रा ४. शेयर , हुंडी , एफ डी आदि

आप देख सकते हैं कि प्रथम श्रेणी सजीव यानि मानव संसाधन अन्य सभी श्रेणी के संसाधनों को नियंत्रित करता है इसलिए वह सर्वोपरि है. उसमें भी सबसे पहले व्यक्ति स्वयं आता है फिर उसके रक्त संबंधी फिर अन्य परिचित. अन्य सजीव में जानवर है क्योंकि वह चल सकते हैं और अपने को बढ़ा भी सकते हैं . अर्ध सजीव भी स्वत: अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं .

निर्जीव धन अपने आप में निष्क्रिय होते हैं और उनकी मूल्यवृद्धि सजीव मनुष्य के लिए उनकी उपयोगिता पर निर्भर है और वह समय समय पर बदलती रहती है.

ऊपर लिखे सभी तरह के धन सभी मनुष्यों के पास नहीं होते हैं लेकिन अगर हम एक देश के स्तर पर सोचें तो हम धन या संसाधन वाली बात अच्छे से समझ सकते हैं . उदाहरण के लिए भारत देश के कुल संसाधन १५ अगस्त १९४७ में कितने थे और अब कितने हैं . तब हमारे सजीव धन में मनुष्य कम थे लेकिन पशु पक्षी , नदी ,तालाब आदि ज्यादा थे . ६५ वर्ष बाद हमारे पास आदमी रूपी सजीव धन बहुत बढ़ गया और बहुत सारी निर्जीव संपत्ति भी इकठ्ठी हो गयी है लेकिन पर्यावरण रूपी सजीव व अर्ध सजीव धन गायब हो गया है.

इसी तरह हम कह सकते हैं कि स्वतंत्रता के समय भी हमारे पास कोयला व धातुएं थीं लेकिन वे भूमिगत थीं पर हमारे उपयोग में नहीं थीं . आज भूमिगत वस्तुएं निकलकर हमारे उपयोग में आ रही हैं लेकिन वास्तविकता में हमारी संपत्ति उतनी ही है जितनी पहले थी .

जिस तरह ऊर्जा पैदा नहीं की जा सकती है , सिर्फ उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है उसी तरह मनुष्य के कुल संसाधन जन्म से मृत्यु तक लगभग स्थिर रहते हैं और सिर्फ उनका सजीव व निर्जीव में लगातार रूपांतरण होता रहता है.

अब मैं इसको अनेक उदाहरणों से स्पष्ट करता हूँ . पैदा होने के समय हमारे पास सिर्फ हमारा स्वस्थ शरीर होता है और एक भी अन्य प्रकार की संपत्ति नहीं होती है लेकिन 100 साल की आयु में मरने के समय हमारे पास तरह तरह की संपत्ति होती है पर हमारी मूल संपत्ति , स्वस्थ शरीर नष्ट हो चुका होता है.

इस तरह से यह साबित होता है कि सर्वश्रेष्ठ संपत्ति या संसाधन केवल हमारा स्वस्थ शरीर ही है जैसा की तुलसीदास जी ने भी कहा है " पहला सुख निरोगी काया , दूजा सुख हो घर में माया ". व्यवसाय के द्वारा काया यानी शरीर को खर्च करके माया हासिल की जाती है और अस्पताल में जाकर थोड़ी माया खर्च करके कुछ काया स्वास्थ्य के रूप में वापस भी मिल जाती है.

जीवन बीमा कम्पनियां भी आपकी काया को नुक्सान होने पर कुछ माया देने का वायदा करती है. सजीव काया का दूसरी सजीव काया या निर्जीव धन ( माया ) में परिवर्तन लगातार होता रहता है लेकिन पेन्डुलम की तरह इनकी अधिकतम सीमाएं भी तय हैं .

पुराने ज़माने में अपने माता पिता के साथ बेरोजगार रहने वाले पुत्र के पास जब निर्जीव धन नहीं होता था तो वह माता पिता रूपी सजीव धन को छोड़कर दूर कहीं व्यापार करने चला जाता था . कुछ समय बाद जब उसके पास काफी निर्जीव धन एकत्रित हो जाता था तो उसे घर के सजीव धन की याद आने लगती थी और वह वापस अपने माँ बाप के पास आ जाता था . फिर उसकी शादी कर दी जाती थी और इस सब के साथ कुछ ही समय में उसका निर्जीव धन समाप्त हो जाता था और एक बार फिर वह माँ ,बाप और पत्नी रूपी सजीव धनों का त्याग करके फिर से निर्जीव धन कमाने चल देता था .

अगली बार फिर धन जमा होने पर वह वापस पहुँचने पर देखता कि उसके घर में एक संतान भी आ गयी है और अब चार सजीव धन उसके कमाए निर्जीव धन को समाप्त कर देंगे . इस तरह समय के बीतने के साथ संतानों की संख्या बढ़ती जाती है , माँ ,बाप की मृत्यु हो जाती है और व्यक्ति व उसकी पत्नी बूढ़े हो जाते हैं इस तरह समय के साथ सजीव से सजीव और निर्जीव में परिवर्तन की कहानी चलती रहती है.

यह कहानी गाँव और शहर में साफ़ दिखती है. शहरों में ज्यादातर लोगों के संताने कम होती हैं और संपत्ति ज्यादा होती है. गाँव में या गरीबों में संताने ज्यादा होती हैं लेकिन पैसे व अन्य संपत्ति की कमी होती है.यही अंतर अमीर और गरीब देशों की आबादी में भी दिखता है .

एक बेहद अमीर व्यक्ति के संतान न होना या अनेक संतानों के साथ झोपडपट्टी में रहने वाले गरीब लोग , दोनों ही स्थितियां दयनीय हैं इसलिए प्राकृतिक संतुलन के लिए सजीव व निर्जीव धन के बीच एक सही अनुपात होना आवश्यक है , इसलिए सजीव व निर्जीव धन के बीच रूपांतरण की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है.

सजीव धन की हानि मृत्यु से ही होती है और उसकी क्षतिपूर्ति ज्यादातर निर्जीव धन से ही की जाती है जैसे बीमा धन , वसीयत या सरकार द्वारा दुर्घटना सहायता राशि मिलना आदि. कभी कभी इसकी सजीव क्षतिपूर्ति भी होती है जैसे किसी की मृत्यु के बाद घर में शादी हो कर बहू आना या संतान होना . इन घटनाओं का क्रम आगे या पीछे कुछ भी हो सकता है और मृत्यु का अर्थ पूर्ण मृत्यु के अलावा मृत्युतुल्य कष्ट या अपमान , असुविधा आदि व्यापक अर्थों में भी किया जाना चाहिए .

अक्सर सामान्य से अधिक दहेज़ रूपी धन शादी में मिलने के बाद घर में लड़ाई झगडा , कचहरी , जेल आदि इसीलिए आरम्भ हो जाता है. असामान्य धन का दूसरा पहलू ( मारक) असामान्य कष्ट ही हो सकता है जबकि ३० दिन का सामान्य कष्ट ( नौकरी) अंत में सामान्य धन ( वेतन ) में परिवर्तित होता है.

मायापति और माया

 सजीव और निर्जीव धन में मूल अंतर को मायापति और माया के रूप में भी समझ सकते हैं जिसमें मायापति अर्थात परमात्मा का एक अंश आत्मा (सजीव) हो और माया जिससे आत्मा घिरी रहती है और जिसे हम शरीर कहते हैं (निर्जीव) . मनुष्य जिन्दगी भर पेंडुलम की तरह इन दो सिरों के बीच घूमता रहता है. पेंडुलम का एक सिरा मायापति के यानी ईश्वर के पास है और दूसरा सिरा अकूत माया का है .


माया के रहस्य को दिए हुए चित्र से समझाया जा सकता है . आदमी एक पेंडुलम की तरह पहले ईश्वर की सृष्टि , माया का स्वामी बनने की कोशिश करता है . यह कोशिश रावण , हिरण्यकश्यप , सिकंदर , नेपोलियन व हिटलर जैसे लोग कर चुके हैं। लेकिन माया उसे जोर का झटका देकर ,अपने वास्तविक स्वामी ईश्वर की शरण में भेज देती है, जिसके कारण या तो आदमी शरीर ही त्याग देता है केवल आत्मा बचती है जो परमात्मा में विलीन हो जाती है। या रातों रात सन्यासी बन जाता है जैसे राजा भर्तृहरि या तुलसीदास .

कुछ लोग माया को इतना नकारते हैं कि ईश्वर के सिवाए उन्हें कुछ सूझता ही नहीं है , उन्हें भी ईश्वर झटके के साथ वापस माया की तरफ भेज देता है.

स्वामी प्रभुपाद ( इस्कान मंदिर ), सत्य साईँ बाबा ( आंध्रप्रदेश वाले ), कृपालु जी आदि , घर बार छोड़ कर निकले थे ईश्वर की खोज में , लेकिन 50 बरस बाद इन सभी के पास अकूत संपत्ति हो गयी . सुदामा गए तो थे कृष्ण के पास फ़कीर बनकर लेकिन लौटे तो माया लेकर . पोप , शंकराचार्य व अन्य साधू संतों के महंथ बनकर माया में लिप्त हो जाना इस का उदाहरण है.

जब तक आपने शरीर धारण कर रखा है तब तक आप माया से पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं और जब तक आप जीवित हैं तब तक आप आत्मा से भी पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं । एक की कीमत पर आप जब दूसरे का ज्यादा ध्यान रखेंगे तो आप को शांति मिलना असंभव है।

इतने सारे उदाहरणों से स्पष्ट है कि लाख प्रयत्नों के बावजूद , धन हमें मिल ही जाएगा ,इसकी कोई गारंटी नहीं है .और मिलने के बाद धन आपके काम आ जाएगा , ये तो और दूर की कौड़ी है। वस्तुत: यह ईश्वर की माया है और इसे चंचला यूंही नहीं कहा गया है .

फिर सही विकल्प क्या है ? उत्तर चित्र में दिखाया गया है. आदमी रूपी पेंडुलम की शांत अवस्था मध्य में है . अर्थात जीवन में उपलब्ध कुल समय का आधा माया प्राप्त करने मेँ लगाना आवश्यक है जिसमें शरीर की सफ़ाई , भोजन व व्यवसाय शामिल हैं ।शेष 12 घंटे आत्मा व मन की संतुष्टि के लिए होने चाहिए जिसमें नींद , ज्ञान -विज्ञान, खेलकूद,मनोरंजन , अध्यात्म , समाजसेवा,परोपकार आदि शामिल हैं ।

न तो संसार से भागिए और न ही संसार से चिपकिये , कबीरदासजी की तरह रहिये , यही धन का निचोड़ है .

आप चाहें तो किशोर कुमार के गाने से भी सीख ले सकते हैं :

"ये समझो और समझाओ थोड़ी में मौज मनाओ
दाल-रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ
अजी लालच में ना आओ ना दिल का चैन गँवाओ
दाल-रोटी खाओ ...

तन पे लंगोटी पेट में रोटी , सोने को एक खटिया
मतलब तो है नींद से चाहे बढ़िया हो या घटिया
राधेश्याम सीता-राम
नफ़रत को दूर हटाओ और सबको गले लगाओ
दाल\-रोटी खाओ ...

चाँदी की थाली वाले को क्या भूख लगे है ज़्यादा )
क्यों ना खा ले फिर आपस में बाँट के आधा-आधा
राधे\-श्याम सीता-राम \-२
भूखे की भूख मिटाओ और सबको गले लगाओ
दाल\-रोटी खाओ ."

  

धन के निवेश से जुड़ा पहलू अगले भाग में प्रस्तुत किया जाएगा .

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