Menu

Use Behavioural Astrology

Blog posts May 2013

Why I did not settle in USA ???

कम्प्यूटर इंजीनियर  अमेरिका प्रयाण कथा को पढ़ने के बाद कुछ मित्रों ने मुझ से पूछा कि आप तो 1992 में ही अमेरिका घूम आए थे फ़िर वहां बसे क्योँ नहीं ? पेश हैं वे कारण जिनकी वज़ह से मैं अमेरिका में नहीं बसा  ..

 

अमेरिका मुझे क्यों पसंद नहीं है ? 

 

एक कारण हो तो बताऊं कि मुझे अमेरिका क्यों पसंद नहीं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि वहां थूकने की स्वाधीनता बिलकुल नहीं है। मुझे आश्चर्य है, वह कैसा प्रजातांत्रिक देश है। हमारे यहां पान-गुटका-तंबाकू खाने वाले तो यत्र तत्र थूकते ही हैं, परस्पर मतभेद रखने वालों के लिए भी थूकना अभिव्यक्ति का कितना शक्तिशाली माध्यम है। थूक लेने के बाद मन को कितनी शांति मिलती है, व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। सभी राजनीतिक दल जानते हैं विरोधी दलों पर थूकना प्रजातांत्रिक अधिकारों के अंतर्गत आता है। अमेरिकी नासमझ इस छोटी-सी बात को क्या जानें? बंकर में छुपे हुए सद्दाम हुसेन को भी जब पहली बार अमेरिकी सैनिकों ने इराक में पकड़ा था तो उसने भी मात्र थूककर गुस्से को अभिव्यक्ति दी थी।

मात्र थूक देना भी अर्थ रखता है। किसी के ऊपर थूकने से पहले देखें, क्या इस पुनीत कार्य के लिए सही व्यक्ति को ही हम चुन रहे हैं? उस पर थूकना है, उसे दिखाकर थूकना है या मात्र थू कहना है। देखते ही थूकें, फिर उसे देखें। नजारा मनोहारी हो सकता है। थूक देना भी एक प्रभावी शस्त्र है जिसका उपयोग बहुत सावधानी से करने की आवश्यकता है। गलत स्थान पर थूक देने से व्यक्ति पिट सकता है। इसीलिए जहां थूकें सोच-समझकर थूकें। गंभीरतापूर्वक विचार करें क्या वहीं थूकना जरूरी है? या इस युद्धोन्मुखी प्रक्रिया को टाला जा सकता है? मंत्रियों के आसपास अंगरक्षकों से अधिक थूकरक्षक होने चाहिए। प्रतिपक्ष का जो नेता सत्ता पक्ष पर, या सत्ता पक्ष का जो नेता प्रतिपक्ष पर अधिक से अधिक थूक सकता है, टिकट पाने का वह उतना ही मजबूत दावेदार बन जाता है।

यदि अमेरिका में सड़क पर कोई थूक दे तो उसे भी टिकट की सुविधा मिल जाती है। बस यहां के टिकट और वहां के टिकट में थोड़ा अंतर है। यहां टिकट मिलता है तो व्यक्ति की चुनाव यात्रा, विमान यात्रा,बस या रेल यात्रा हो जाती है किन्तु वहां टिकट मिलता है तो व्यक्ति की अदालत यात्रा या जेल यात्रा हो जाती है। यहां का टिकट सुविधायुक्त जबकि वहां का टिकट अभियुक्त बनाता है। यहां का टिकट घमंड जबकि वहां का टिकट दंड देता है। कई परंपराएं वहां ऐसी हैं जिन पर थूकने की भी इच्छा नहीं होती, किन्तु गलती से भी कहीं थूक दिया कि कॉप याने पुलिस के घेरे में आ गए। पर जहां किसी प्रकार की थू थू ही न हो वह भी कोई रहने योग्य स्थान है? मेरी हो या तेरी हो, थू थू तो होनी चाहिए, उसके बिना जीवन नीरस नहीं हो जाएगा? मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए। दुष्यंत कुमार ने भले ही न सोचा होगा किन्तु इन पंक्तियों के पीछे थू थू करने कराने का ही आशय रहा होगा। बात का सार संक्षेप यह कि जिस देश में हम थूक नहीं सकते, थू थू नहीं कर सकते वहां रहने में क्या आनंद? राजा-महाराजाओं के जमाने में पीकदान हुआ करते थे, इन दिनों समूचा हिन्दुस्तान ही यहां के सुयोग्य नागरिकों के सहयोग से पीकदान बन चुका है।

थूकने के मामले में अपना देश सचमुच स्वर्ग है, कहीं भी दिल खोलकर थूको । चाहे जिस पर थूको, जितना मर्जी में आए उतना थूको। बस उसके बाद वाली स्थिति से निपटने के लिए आर्थिक एवं राजनीतिक मजबूती हो। अमेरिका में कहीं भी थूकेंगे तो पुलिस हाथ दिखाएगी, हिन्दुस्तान में किसी पर थूकोगे तो ही सामने वाला हाथापायी करेगा।

अमेरिका के अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवार नाव रखते हैं, शनिवार, रविवार आदि छुट्टी के दिनों में ट्राली पर रखकर सुबह से ही पास की नदी या झील में डाल देते हैं, फिर दिन भर पानी के बीच सैर या मस्ती का आनंद लेते रहते हैं। पानी से खेलना वहां के लोगों का शौक है। वे क्या जानें आग से खेलना। यहां के लोगों की तो मजबूरी थी, अब भले ही शौक बन गया है। यहां के लोग यदि पानी से खेलने लगें तो उनका पानी मर जाए, वे स्वयं भूखे मर जाएं। यहां तो मात्र सत्ताधीश ही पानीदार रह सकते हैं। कर्णधारों ने तो समाज पर पानी फेर दिया और नागरिकों को लहरें गिनने के काम में लगा दिया। भारतीय मतदाता इसीलिए तो पानी पी-पीकर कभी इन्हें, कभी उन्हें कोसता रहता है। इसके अलावा वह और क्या कर सकता है? वैसे पानी से खेलना भी कोई काम है? भारतीय बच्चे ही बरसात के दिनों में पानी में खेलते रहते हैं। जो काम यहां के बच्चे कर लेते हैं, वह काम वहां के बड़े-बूढ़े लोग करते हैं। यह पक्का है वे आग से नहीं खेल सकते। इस तरह बच्चों जैसे काम करते हैं, इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

वहां बच्चों के स्कूल के पास वाली सड़क से पंद्रह मील प्रति घंटे से अधिक की गति से किसी वाहन के निकलते ही वाहनचालक को टिकट थमा दिया जाता है। सड़क पर किसी का पांव भी आ जाए तो कार वाला पचास फुट दूर कार खड़ी कर देता है। यहां तो कोई बच्चा या बूढ़ा बीच में गलती से आ जाए तो सत्तर-अस्सी मील प्रति घंटे की गति से कुचलते हुए भाग जाने की स्वाधीनता है। बच्चे या बूढ़े ने सड़क का नियम क्यों तोड़ा? भारतीय प्रजातंत्र पद्धति में मटरगश्ती या अपराध करने की जो स्वतंत्रता है वैसी अमेरिका में कहां? इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं।

वहां हॉर्न बजाना ही गाली देना माना जाता है। व्यस्त सड़कों पर घंटों यात्रा कर लीजिए, हॉर्न की एक भी आवाज सुनने को नहीं मिलेगी। यदि दो कारें समानान्तर दौड़ रही हैं और किसी एक ने दूसरे को ओवरटेक करने यानी आगे जाने के लिए रास्ता दे दिया है, तो दूसरा व्यक्ति पहले को थैंक्स कहता ही है। यहां पर ओवरटेक कर आगे जाने वाले को गाली देने की स्वतंत्रता है : स्साले कब से हॉर्न बजा रहा हूं, गाड़ी एक तरफ नहीं करता? गाली देने या सुनने का जो सुख जो हिन्दुस्तान में है, वह अमेरिका में कहां ? इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

प्रातः भ्रमण पर वहां निकल जाएं, परिचित हो या अपरिचित, पुरुष हो या महिला, हेलो, हाय करते हुए हाथ हिलाकर अभिवादन अवश्य करते हैं। हिन्दुस्तान के अभिजात वर्ग के दबदबे का वहां अभाव है। यहां छोटा आदमी ही बड़े को नमस्कार करता है और सभी स्वयं को बड़ा ही मानते हैं। अतः कोई किसी को क्यों नमस्कार करे? हेलो, हाय करने के आदी इन छोटे लोगों की बात क्या करना? इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

वहां लेखक द्वारा पुस्तक भेंट करने की प्रथा नहीं है, लोग किताबें खरीदकर पढ़ते हैं। हिन्दुस्तान में लेखक से आशा की जाती है कि वह पुस्तक भेंट में देगा, बाद में पुस्तक भी अनपढ़ी रह जाएगी। कई पाठकों को पढ़ने का तो बहुत शौक होता है बशर्ते कोई किताब भेंट कर दे। वहां की राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में कहीं जाइए, वे लोग पुस्तक पढ़ते हुए या लैपटॉप पर काम करते हुए ही देखे जाते हैं। अपने में मगन रहते हैं। असल में निंदा-स्तुति करने की न उनकी आदत है, न अनुभव है, अतः क्या समझें उसका मज़ा? वे हमारी तरह काम कम और बातें ज्यादा क्यों नहीं करते? छटांक भर की जीभ चलाने में भी कंजूसी बरतते हैं? कंजूस कहीं के। इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

वहां के उच्च पदासीन नागरिक भी स्वाधीन देश में रहते हैं, फिर भी समय के इतने पाबंद क्यों हैं? भारतीयों की तरह मन के राजा क्यों नहीं हैं? हमारे लोग प्रतिनिधि बनते ही, फिर वह चाहे जनता के हों या कर्मचारियों के, हर कार्य विलंब से करना शुरू कर देते हैं। देरी से आने से उनकी धाक जम जाती है कि अब वह वहुत व्यस्त हो गए हैं। काम पर कभी भी आने, कभी भी चले जाने की स्वाधीनता वहां नहीं है। इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

अमेरिका में बस में बैठने के लिए, सामान खरीदने के लिए हर जगह लाइन में लगना पड़ता है, धक्कामुक्की करने की न कोई मानसिकता न ही आवश्यकता, किन्तु जो मजा सामनेवाले को पटककर, उसे धूल चटाकर, बिना लाइन में लगे या सबसे बाद में लगकर सबसे पहले सामान लेने में है, वैसा मजा अमेरिका में कहां? परिवार कल्याण कार्यक्रमों के लिए सरकार कितना भी जोर लगा ले, किन्तु कई बहादुर अभी भी लाइन लगाने में पीछे नहीं हैं। ऐसी शौर्यपूर्ण मानसिकता, और तत्परता क्योंकि वहां नहीं है, अमेरिका मुझे पसंद नहीं।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए थियेटर में फिल्म देखने, कटिंग कराने में या अन्य कई स्थानों पर तीस प्रतिशत की रियायत दी जाती है। वहां सीनियर सिटिजन की हजामत दस डॉलर में बन जाती है जबकि अन्य लोगों की पन्द्रह डॉलर में। स्पष्ट है, उन लोगों को सही तरीके से हजामत करने का तरीका भारतीयों से सीखना चाहिए। यहां तो चारों ओर हजामत करने का लक्ष्य लिए विशेषज्ञ खड़े ही रहते हैं। यहां सिर्फ बाल कटवाने में हीं नहीं, प्रत्येक उपकरण या सामान खरीदने में दुकानदारों द्वारा हजामत कर दी जाती है। क्योंकि उन लोगों ने भारतीयों से सही तरीकों से हजामत करने के गुर नहीं सीखे, इसलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

अमेरिका में अपंगों, अस्वस्थ जनों, बुजुर्गों के लिए विशेष सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार देखा जाता है। बसों में चढ़ने, बैठने, उतरने के लिए उनके लिए विशेष व्यवस्था रहती है। वहां फ्रिज, सोफा, वाशिंग मशीन बार-बार रिपेयर नहीं कराए जाकर कचरे के स्थान पर फेंक दिए जाते हैं, जो चाहे मुफ्त में ले जाए। वहां मनुष्यों के ही नहीं, कुत्ते-बिल्लियों के भी अस्पताल और डॉक्टर होते हैं, जहां अच्छा इलाज किया जाता है। वहां आदमी की जि़न्दगी सबसे मूल्यवान मानी जाती है जिसे बचाया जाता है। भारतवर्ष में फ्रिज, सोफा, वाशिंग मशीन बार-बार रिपेयर कराए जाते हैं। ये वस्तुएं कीमती मानी जाती हैं, किन्तु मनुष्य को प्रायः कुत्ते-बिल्ली की मौत मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। मां-बाप और अपंगों को जो चाहे मुफ्त में ले जाए। देख-रेख करे। बच्चे प्रगति कर रहे हैं। वहां रोगियों का इलाज पहले किया जाता है फीस बाद में ली जाती है। यहां रोगियों की थोड़ी-सी शल्य चिकित्सा करके उनके घरवालों को मनमानी फीस बताई जाती है, फिर कहा जाता है, पहले फीस जमा कर दें ताकि आगे बढ़ा जाए। अन्यथा रोगी को अन्यत्र ले जाएं। अमेरिका ने ऐसी प्रगति नहीं की, इसलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

( Courtesy : Sh. Hari Joshi , Hindisamay ) 

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 17

अमेरिका प्रयाण कथा अंतिम अध्याय ( 17 ) 

स सीरिअल से नौ दो ग्यारह होने का वक्त आ गया है पर उस से पहले अमेरिका में  नौ सौ ग्यारह की महिमा जानना अनिवार्य है। 

 नौ सौ ग्यारह की महिमा अमेरिका मे अनंत है। बड़े काम का नंबर है। दमकल, ऐंबुलेंस या फिर पुलिस को बुलाने के लिए नौ सौ ग्यारह नंबर घुमाया नहीं कि मिनट भर में पुलिस की गाड़ी दरवाज़े पर होती है। एक बार तो किसी नये रंगरूट को कंपनी से मिली निर्देशपुस्तिका में लिख दिया गया था कि आपातकाल में यह नंबर मिलाओ। भाई ने हवाईअड्डे पर कंपनी की भेजी टैक्सी न पाकर हड़बड़ाहट में नौ सौ ग्यारह घुमा दिया। फिर तो लालनीली बत्ती वाली टैक्सी के ड्राइवर यानि कि पुलिसवाले ने जो लेक्चर पिलाया कि पूछिए मत।

बड़े तो बड़े अक्सर बच्चे भी यह हरकत करते हैं। पहली ही कक्षा में इस नंबर का महत्व सिखा दिया जाता है। हमारे मित्र अहलूवालिया जी पर बड़ी बुरी मार पड़ी इस नंबर की। उनके दोनों नटखट पुत्र स्कूल से घर आकर कुरूक्षेत्र का मैदान बना डालते हैं।

 

पिछली गर्मियों में उन्होंने बड़े चाव से माता–पिता को भारत से बुलाया। लंबी हवाई–यात्रा से थके वरिष्ठ अहलूवालिया जी फिलाडेल्फिया की गुनगुनी धूप में सुस्ता रहे थे कि स्कूल से शैतानों की टोली आ धमकी। इन शैतानों के माता–पिता दोनों काम करते थे और बच्चों को स्कूल के बाद डेकेयर जिसे भारत मे क्रेच कहते हैं में रहना होता था। पर अब तो देखभाल के लिए दादी–बाबा थे। दोनों शरारतियों को दादी ने बड़े प्यार से खाना खिलाया। पर खाना खिलाने में दादी को दोनों ने बहुत हैरान किया। खाने के बाद दोनों की धमाचौकड़ी शुरू हो गई। ज़ोर से टी .वी .चलाना, उछलकूद, गुलगपाड़ा।


बेचारे थके हारे दादाजी हैरान होकर पहले तो समझाते रहे फिर डांटने लगे। पर इन अमेरिकन लंगूरों को सब बेअसर। बेचारे दादाजी ने आज़िज़ आकर समस्या का हिंदुस्तानी इलाज करने की ठानी और बच्चों के बाप को बचपन में पढ़ाया पाठ अपने पोतों पर आज़मा डाला। दादाजी ने दो तमाचे रसीद करके उनके कान उमेठ दिए। छुटका पोता तो बुक्का फाड़के रोने लगा और बड़े वाले ने आव देखा न ताव नौ सौ ग्यारह घुमा दिया। दो मिनट में पुलिस देख कर दादाजी हैरान। पुलिस ने घर में मकान मालिक को गैरहाज़िर देख और बच्चो का क्रंदन देख कर दादा–दादी को थाने उठा ले गई और बच्चों को पड़ोसी के हवाले कर दिया।

शाम को अहलूवालिया जी आफ़िस से घर पहुंचे तो पड़ोसी ने रामकथा सुनाई, सुनकर अहलूवालिया जी के हाथ के तोते उड़ गए। बेचारे उल्टे पांव थाने भागे। बहुत मुश्किल से पुलिस वालों को अपने पिताश्री के स्थानीय कायदे–कानूनों से नावाकिफ़ होने और वृद्ध होने का वास्ता देकर छु.ड़वाया। पर उनके पिताजी का पारा तो सांतवे आसमान पर था। सारे रास्ते पिताश्री लेक्चर देते रहे कि 'ऐसी जगह रहने के क्या फ़ायदा जहां आप बच्चो को काबू में नहीं रख सकते, पुलिस भी बेअक्ल है चोरों और शरीफ़ों में फ़र्क की तमीज़ तक नहीं वगैरह–वगैरह।' अगली ही फ्लाइट से दोनों प्राणी अपने उस वतन वापस चले गए जहां उनका कानून चलता है।


दिल्ली स्टेशन पर चांटो की बौछार


अहलूवालिया जी मन मसोस कर रह गए। लड़का उजड्ड होता जा रहा था। दादाजी को थाने पहुंचा कर शेर हो गया था। अहलूवालिया जी पिताजी के गुस्सा होकर चले जाने से बड़े दुखी थे, पर कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि नौ सौ ग्यारह नंबर का जिन्न उन्हें समस्या का हिंदुस्तानी तरीके से इलाज करने से रोक देता था। खैर अगली छुट्टियों मे अहलूवालिया जी सपरिवार भारत यात्रा पर गए। हवाई अड्डे पर रात के वक्त विमान पहुंचा। बच्चों ने लिम्का फैंटा जो मांगा अहलूवालिया जी ने सब दिलाया। हवाई अड्डे से दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाने वाली बस में सब बैठे। अचानक अहलूवालिया जी ने अपने लिम्का पीते बड़े लड़के के तड़ातड़ तीन तमाचे रसीद कर दिए। लड़का बुक्का फाड़ के रोने लगा। यह देख कर कंडक्टर बोला 'अरे भाईसाहब, लड़का तो चुपचाप बैठा है, क्यों उसे आप खालीपीली पीट रहे हैं?' अहलूवालिया जी दहाड़े 'तू चुप बैठ। यह मेरे घर का निजी मामला है।' कंडक्टर सहम गया। अब अहलूवालिया जी अपनी विलापरत संतान से मुख़ातिब हुए, 'ओये खोते दे पुत्तर ! अब मिला नौ सौ ग्यारह। साले यहां तो पुलिस भी तुझे ही कूटेगी मुझे नहीं।'


चटोरा कुत्ता


हमारे एक मित्र हैं विजय श्रीवास्तव। बड़े रोचक स्वभाव के जीव हैं। भारत मां के सच्चे पुत्र। अमेरिका में रहकर भी भारतीयता का झंडा पूरी शान से बुलंद किए हुए हैं। उनको फ़ोन करिए तो हैलो कि जगह 'जय माता दी' का उदघोष सुनने को मिलता है। भारतीय परंपरा के साथ भारतीय भोजन के भी शौकीन है। एक बार बड़ी मज़ेदार समस्या से दो–चार हुए हमारे विजय भाई। उनके पड़ोसी के प्यारे कुत्ते ने खाना पीना छोड़ दिया। चिंताग्रस्त पड़ोसी अपने कुत्ते को पशुचिकित्सक के पास ले गया। पशुचिकित्सक ने जांच–पड़ताल के बाद फ़रमाया कि कुत्ता तो एकदम भला चंगा है। अब पड़ोसी सिर खुजाने लगा कि आख़िर कुत्ते का पेट भरता कैसे है। उसने घर के आसपास वीडियो कैमरे फिट कर दिए, कुत्ते पर निगरानी रखने के लिए। कुछ दिन की जासूसी के बाद उसे पता चल गया कि क्यों उसके पड़ोसी श्रीवास्तव साहब रोज़ अपने कू.ड़ेदान के गिरने और कूड़ा फैलने पर हैरान होते हैं? यह उसका प्यारा कुत्ता ही था जिसे कुत्तों के लिए बना पौष्टिक पर बेस्वाद खाना पसंद नहीं आता था। किसी दिन इस कुत्ते ने श्रीवास्तव साहब के कूड़ेदान से बचीखुची पूड़ी–कचौड़ी और मसालेदार सब्ज़ी क्या खा ली, उस श्वान का शाश्वत सच से साक्षात्कार हो गया।


बेचारे कुकुर को पता चल गया कि वह और उसका मालिक दोनों पौष्टिक खाने के नाम पर ताउम्र बकवास खाते रहे और कितने स्वादिष्ट खाने से महरूम रहे। अब वह बेचारा बेजुबान अपने मालिक को तो समझा नही सकता था, इसलिए अपनी पेटपूजा श्रीवास्तव साहब के कू.ड़ेदान में कर लेता था और अपने मालिक को बेस्वाद पास्ता सलाद वगैरह लीलते देख उनकी किस्मत पर तरस खाता था। कुत्ते के मालिक को उसकी यह हरकत नागवार गुज़री और उसने श्रीवास्तव जी को घु.ड़का कि अगर उन्होंनें कु.ड़ेदान को ठीक से बंद नही रखा और उनका कू.ड़ा खाने से कुत्ता बीमार पड़ा तो वह मुकदमा ठोंक देगा। श्रीवास्तव जी डर गए और बेचारे कू.ड़ा घर के अंदर ही रखने लगे। इधर कुत्ते ने भूखहड़ताल कर दी। बेचारा पड़ोसी फिर दौड़ा पशुचिकित्सक के पास। उसने पूरी रामकहानी सुनकर कहा, 'कुत्ते को वही दो जो वह खाना चाहता है वरना वह भूखे ही दम तोड़ देगा।' सुना है आजकल श्रीवास्तव जी का पड़ोसी उनसे छोले भटूरे और कचौड़ियां बनाना सीख रहा है।


अनोखेलाल जी खो गये?


यह संवेदनशील घटना हमारे मित्र अनोखेलाल आहूजा जी के साथ घटी। अनोखेलाल जी हमारी फिलाडेल्फिया की मित्र–मंडली के अभिन्न सदस्य हैं। हर समोसा पार्टी उनके बिना अधूरी मानी जाती है। आहूजा जी आजकल घर ख़रीद रहे हैं। अपने निर्माणाधीन घर में कभी भूमि पूजन तो कभी कुदाली पूजन के नाम पर उन्होनें अमेरिकन कारीगरों को भारतीय संस्कृति और वास्तुशास्त्र से भली–भांति परिचित करा दिया है। आहूजा जी अक्सर वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर की डील वगैरह ढूंढ़ते पाए जाते हैं। हमारी समोसा पार्टियां अक्सर उनके बिना वीरान रहती हैं। अगर कभी भूले भटके आ भी गए तो नाना प्रकार की जानकारी के सागर में हम सबको डुबो देते हैं। अब हमें पता हो चला है कि घर कि घास कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है। उसे कितनी बार काटना चाहिए, कब छोड़ना चाहिए वगैरह–वगैरह।


एक बार किसी मित्र की पैंतीस वर्षीया बीबी के अठ्ठाईसवें जन्मदिवस की पार्टी में आहूजा जी कि बीबी तो पहुंच गई पर आहूजा जी नदारद। सेलफ़ोन भी नहीं उठा रहे थे। हमने अंदाज़ लगाया कि शायद आफ़िस में कोई मीटिंग लंबी खींच गई थी। पार्टी ख़त्म होने के बाद सब घर चले गए। रात दस बजे श्रीमती आहूजा का फ़ोन आया। आहूजा जी घर नहीं पहुंचे थे। आफ़िस का फ़ोन कोई उठा नहीं रहा था। उनका सेलफ़ोन भी आफ़ लग रहा था। हम सपत्नीक आहूजा जी के घर पहुंचे तो श्रीमती आहूजा रूंआसी हो गईं। बात वाकई चिंताजनक थी, मैं सोच रहा था कि कभी–कभी विदेश में व्यक्ति कितना असहाय हो जाता है तकलीफ़ आते ही। रिश्तेदार तो होते नहीं, मित्र भी न हों तो कितना मुश्किल हो जाए विपत्ति का सामना करना। मैंने एक मित्र को फ़ोन लगाया, वह चौंका 'अरे अभी दस बजे तक तो हम सब साथ थे, क्या याद आ गया?' मैंने कहा, 'अनोखेलाल जी खो गए।' मित्र चौंका, 'अरे यार क्या मज़ाक कर रहे हो?' मैंने सारी रामकहानी बताई। हमने यह फ़ैसला किया कि मित्र उनके निर्माणाधीन घर की तरफ़ जाकर देखें कि कहीं वे घर में कोई नापजोख़ करने गए हों और कार वगैरह ख़राब हो गई हो।


मेरी पत्नी उनके बच्चों को संभलाने लगीं और मैं श्रीमती आहूजा जी के साथ आहूजा जी के आफ़िस चल दिया। रास्ते में पत्नी का फ़ोन आया कि आहूजा जी मिल गए हैं और आप दोनों के पास आफ़िस आ रहे हैं। उनके आफ़िस के पार्किंग लाट में आहूजा जी के दर्शन हुए। आहूजा जी हैरान थे कि उनके देर से आने पर इतनी त्राहि–त्राहि क्यों मची है? श्रीमती आहूजा जी की हालत बांध टूटने से पहले क्षणभर ठहरी नदी की थी। इससे पहले यह नदी बहे, मैंने पूछा, 'महाराज आप कहां थे?' पता चला आहूजा जी को शाम को आफ़िस में किसी हाट डील का पता चल गया। जनाब सीधे दौड़ लिए स्टोर। सेलफ़ोन की बैटरी दिन में ही चुक गई थी। दुकान के सेल्समैन भी उस दिन शायद खाली बैठे थे। आहूजा जी पहले विस्तार से वाशिंग मशीन के विविध फीचर समझते रहे, फिर सौदेबाज़ी करते रहे और तकरीबन तीन घंटे झेलने के बाद सेल्समैन ने अपने मैनेजर को बुला लिया। मैनेजर ने कुछ ऐसे प्रस्ताव फेंके कि आहूजा जी ने उस दिन वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर, सोफा और न जाने क्या–क्या ख़रीद डाला। इस सबमें दस बजने का पता ही नहीं चला। अब पार्किंग लाट में आहूजा दंपत्ति के मध्य तानों और शिकवों के बादल गरज रहे थे। इतने गर्जन–तर्जन के बाद बरसात होनी अवश्यंभावी थी अतः मैंने फूट लेने में भलाई समझी।

 

समाप्त 

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 16

भयो प्रगट कृपाला 

 

 

अमेरिका में प्रसव की तैयारी बहुत ही विधिवत ढंग से होती है। बकायदा अस्तपताल में निशुल्क कक्षाएं लगती हैं, शिशुपालन की भी और प्रसव कैसे होता है उसकी भी। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक टूर भी कराया जाता है जिसमें यह बता दिया जाता है कि प्रसव वाले दिन किस रास्ते से आना है, मैटरनिटी वार्ड के लिए अलग लिफ्ट और अलग रास्ते की व्यवस्था होती है। यहां प्रसव में पति को उपस्थित रहने का विकल्प भी होता है और अगर शल्य चिकित्सा हो रही हो तो वह देखने का भी।

मेरा विचार यह बना कि यह नियम भारत में बजाए विकल्प के आवश्यक कर देना चाहिए, किसी धर्म के कठमुल्ले विचारों की परवाह किए बगैर। मुझे लगता है कि संस्कृति और धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रसवगृह में जूझते छोड़ अस्पताल के बाहर चाय आमलेट उड़ाते हिंदुस्तानी पतियों को जब तक सृजन में होने वाली वेदना का साक्षात दर्शन नही होगा, उन्हें सृजन की पीड़ा का पता नहीं चलेगा। अगर एक बार यह हो जाए तो अंधाधुंध बढ़ती आबादी पर रोक लगाने की अक्ल भी आ जाएगी और दुर्गा, सीता का नाम ले लेकर कन्या भ्रूण के खून से हाथ रंगने से पहले हाथ भी कांपेंगे।

ख़ैर निश्चित दिन पर हम अस्पताल पहुंचे और कमरा देख कर दंग रह गए। अच्छा ख़ासा होटल का कमरा दिख रहा था। आक्सीजन सिलेंडर, ग्लूकोज़ चढ़ाने की नली और बाकी संयत्र वस्तुतः कमरे की दीवारों में लकड़ी की दीवारों के पीछे छिपे थे, ताकि किसी को उन्हें देख कर अनावश्यक मानसिक तनाव न हो। श्रीमती जी के लिए टीवी सेट भी लगा था और उसपर प्रेटीवीमेन चल रही थी। कुछ देर में डाक्टर आए तो श्रीमती जी ने निर्देश थमा दिया कि उन्हें पुत्र या पुत्री का क्या नाम रखना है। श्रीमती जी को दो–दो शंकाएं थी, पहली कि शायद हमने उन्हें पुत्र वाली सूचना मन बहलाने के लिए बता रखी है और दूसरी कि प्रसव के बाद उनकी बेहोशी का फ़ायदा उठाकर कहीं हम बर्थ सर्टिफ़िकेट पर बांकेबिहारी नाम न चढ़वा दें। डाक्टर उन्हें आश्वस्त करके शल्यकक्ष ले गए मुझे बाहर खिड़की के पास इंतज़ार करने की सलाह देकर।


करीब पंद्रह मिनट बाद ही एक नर्स हाथ में गुलाबी सा खिलौना लिए आ रही थी हमारी ओर। श्री–श्री एक हज़ार आठ बांके बिहारी जी महाराज का पदार्पण हो चुका था हमारे परिवार में। माननीय बांके जी की भरपूर फ़ोटो खींची गईं। श्रीमती जी को बहुत कोफ़्त हो रही थी अस्पताल में। शाकाहारी भोजन के नाम पर उबली गोभी, गाजर खानी पड़ रही थी और बाहर से खाना लाने पर पाबंदी थी। एक नरमदिल नर्स उन्हें जूस और फल वगैरह देकर दिलासा दे जाती थी। तीन दिन बाद हमें छुट्टी मिल जानी थी। छुट्टी वाले दिन दो अनुभव हुए। यह बताया गया कि बच्चे की कार सीट लाए बिना आपको बच्चा घर नहीं ले जाने दिया जाएगा। मेरे पास कारसीट थी पर नवजात शिशु के लिए 'हेडरेस्ट' एक विशेष किस्म का तकिया लाना रह गया था। 'टवायस आर अस' गया तो एक सेल्सगर्ल ने पूछा कि बेटे के लिए लेना है या बेटी के लिए। जवाब सुनने पर वह कुछ परेशान होकर बोली अभी मेरे पास कोई नीला 'हेडरेस्ट' नही है सिर्फ़ गुलाबी है। उसने गुलाबी 'हेडरेस्ट' देते हुए कहा कि दो दिन बाद आकर नीले रंग वाले से बदल लेना। मैं सोच रहा था कि माना गुलाबी रंग लड़कियों पर फबता है पर 'चलता है' वाली प्रवृति के चलते उसकी सलाह नज़रअंदाज़ कर दी।

गुलाबी या नीला                                   

 

अस्पताल में डाक्टरों ने भली–भांति कारसीट की जांच की, गुलाबी हेडरेस्ट देखकर नाक सिकोड़ी और पूरे दो घंटे तक निर्देश दिए कि बच्चे की देखभाल कैसे करनी है। कुछ बातें जहां काम की थी वहीं कुछ सलाह अजीबोग़रीब लग रहीं थी। जैसे कि बच्चा अगर रात में रोए तो या तो भूखा होगा या उसका बिस्तर गीला होगा। कुछ ऐसा लग रहा था कि हम नए माडल कि कार घर ले जा रहे हो और सेल्समैन उसके फीचर्स के बारे में विस्तार से बता रहा हो। बांके बिहारी हमें टुकुर–टुकुर देख रहे थे, मानो कह रहो हों 'पिताश्री, ठीक से निर्देश समझ लो। बाद में न कहना कि हमने रात में गदर क्यों काटी है या आप सबको हर दो–दो घंटे में क्यों उठा रहा हूं। यह सब तो पैकेज्ड़ डील है।' अस्पताल से घर आने के पंद्रह दिन में ही पिंक या ब्लू का अमेरिकी कांसेप्ट अच्छी तरह से दिमाग़ में घुस गया। हर मिलने वाला छूटते ही कहता था कि बड़ी सुंदर बेटी है हमारी। हम हैरान कि अच्छा ख़ासा लड़का सबको लड़की क्यों दिख रहा है। किसी अनुभवी दोस्त ने बताया कि यह समस्या लेबलिंग की है। अगर आटे की बोरी पर चावल का भी लेबल लगा दो तो एक औसत अमेरिकी उसे आटे के दाम पर ख़रीद लेगा। यहां मैंने बांके की कारसीट में गुलाबी 'हेडरेस्ट' लगाकर लड़की होने का लेबल लगा दिया था।

 

 

Go Back

Critical Assessment of Astrology -9

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश - 9 )

 

ज्योतिष सिर्फ नक्षत्रों का अध्ययन नहीं है। वह तो है ही! तो वह तो हम बात करेंगे। साथ ही ज्योतिष और अलग-अलग आयामों से मनुष्य के भविष्य को टटोलने की चेष्टा है कि वह भविष्य कैसे पकड़ा जा सके। उसे पकड़ने के लिए अतीत को पकड़ना जरूरी है। उसे पकड़ने के लिए अतीत के जो चिह्न आपके शरीर पर और आप के मन पर छूट गए हैं, उन्हें पहचानना जरूरी है।

आपके शरीर पर भी चिह्न हैं, आपके मन पर भी चिह्न हैं। और जब से ज्योतिषी शरीर के चिह्नों पर बहुत अटक गए हैं तब से ज्योतिष की गहराई खो गई। क्योंकि शरीर के चिह्न बहुत ऊपरी हैं। आपके हाथ की रेखा तो आपके मन के बदलने से इसी वक्त भी बदल सकती है।

आपकी जो आयु की रेखा है, अगर आपको भरोसा दिलवा दिया जाए हिप्नोटाइज करके कि आप पंद्रह दिन बाद मर जाओगे, और आपको पंद्रह दिन तक रोज बेहोश करके यह भरोसा पक्का बिठा दिया जाए कि आप पंद्रह दिन बाद मर जाओगे, आप चाहे मरो या न मरो, आपकी उम्र की रेखा पंद्रह दिन के समय पर पहुंच कर टूट जाएगी। आपकी उम्र की रेखा में गैप आ जाएगा। शरीर स्वीकार कर लेगा कि ठीक है, मौत आती है।

शरीर पर जो रेखाएं हैं वे तो बहुत ऊपरी घटनाएं हैं; भीतर गहरे में मन है। और जिस मन को आप जानते हैं वही गहरे में नहीं है, वह तो बहुत ऊपर है; बहुत गहरे में तो वह मन है जिसका आपको पता नहीं है। इस शरीर में भी गहरे में जो चक्र हैं, जिनको योग चक्र कहता है, वे चक्र आपकी जन्मों-जन्मों की संपदा का संगृहीत रूप है। आपके चक्र पर हाथ रख कर जो जानता है वह जान सकता है कि कितनी गति है उस चक्र की। आपके सातों चक्रों को छूकर जाना जा सकता है कि आपने कुछ अनुभव किए हैं कभी या नहीं।


अब मैं सैकड़ों लोगों के चक्रों पर प्रयोग किया हूं। तो मैं हैरान हुआ कि एकाध या ज्यादा से ज्यादा दो चक्रों के सिवाय आमतौर से तीसरा चक्र शुरू ही नहीं होता, वह गति ही नहीं की है उसने कभी, वह बंद ही पड़ा है। उसका कभी आपने उपयोग ही नहीं किया।

तो वह आपका अतीत है। उसे जान कर अगर एक आदमी मेरे पास आए और मैं देखूं कि उसके सातों चक्र चल रहे हैं, तो उससे कहा जा सकता है कि यह तुम्हारा अंतिम जीवन है, अगला जीवन नहीं होगा। क्योंकि सात चक्र चल गए हों तो अगले जीवन का अब कोई उपाय नहीं है। इस जीवन में निर्वाण हो जाएगा, मुक्ति हो जाएगी।


महावीर के पास कोई आता तो वे फिक्र करते इस बात की कि उस आदमी के कितने चक्र चल रहे हैं? उसके साथ कितनी मेहनत करनी उचित है, क्या हो सकेगा उसके साथ? मेहनत करने का कोई परिणाम होगा या नहीं होगा? या कब हो पाएगा? या कितने जन्म लगेंगे?

भविष्य को टटोलने की चेष्टा है ज्योतिष--अनेक-अनेक मार्गों से। उनमें एक मार्ग, जो सर्वाधिक प्रचलित हुआ, वह ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव मनुष्य के ऊपर। उसके लिए वैज्ञानिक आधार रोज-रोज मिलते चले जाते हैं। इतना तय हो गया है कि जीवन प्रभावित है। और जीवन अप्रभावित नहीं हो सकता है।

दूसरी बात ही कठिनाई की रह गई है: क्या व्यक्तिगत रूप से? एक-एक इंडिविजुअल प्रभावित है? यह जरा चिंता वैज्ञानिकों को लगती है कि एक-एक व्यक्ति? तीन अरब, साढ़े तीन अरब, चार अरब आदमी हैं जमीन पर, क्या एक-एक आदमी अलग-अलग ढंग से?

लेकिन उनको कहना चाहिए, यह इतनी परेशानी की बात क्या है! अगर प्रकृति एक-एक आदमी को अलग-अलग ढंग का अंगूठा दे सकती है इंडिविजुअल, और रिपीट नहीं करती। इतनी बारीकी से हिसाब रख सकती है प्रकृति कि एक-एक आदमी को जो अंगूठा देती है, वह इंडिविजुअल, कि उसकी छाप किसी दूसरे आदमी की छाप फिर कभी नहीं होती। अभी ही नहीं, कभी नहीं होती! जमीन पर अरबों आदमी रहे हैं और अरबों आदमी रहेंगे, लेकिन मेरे अंगूठे की जो छाप है वह दोबारा फिर नहीं होगी।

आप हैरान होंगे कि मैंने एक अंडे के दो जुड़वां बच्चों की बात कही। उनके भी दोनों अंगूठे एक नहीं होते। उनके भी दोनों अंगूठों की छाप अलग होती है। अगर प्रकृति एक-एक आदमी को इतना व्यक्तित्व दे पाती है कि अंगूठे जैसी बेकार चीज को, हम सबको जो बेकार ही है, कुछ खास प्रयोजन का नहीं मालूम पड़ता, उसको इतनी विशिष्टता दे पाती है, तो एक-एक व्यक्ति को आत्मा और जीवन विशिष्ट न दे पाए, कोई कारण नहीं मालूम होता।

पर विज्ञान बहुत धीमी गति से चलता है। और ठीक है, वैज्ञानिक होने के लिए उतनी धीमी गति ठीक है। जब तक तथ्य पूरी तरह सिद्ध न हो जाएं तब तक इंच भी आगे सरकना उचित नहीं है। प्रोफेट्स, पैगंबर तो छलांगें भर लेते हैं। वे हजारों-लाखों साल बाद जो तय होगी, उसको कह देते हैं। विज्ञान तो एक-एक इंच सरकता है। और प्राइमरी स्कूल के बच्चे के दिमाग में जो बात आ सके, वही बात! वह बात नहीं जो कि प्रोफेट्स और विज़नरीज़, सपने देखने वाले लोग जो दूर-दूर की चीजें देख लेते हैं उनकी समझ में आ सके, उतनी बात। नहीं, उससे विज्ञान का उतना प्रयोजन नहीं है।

 

ज्योतिष मूलतः चूंकि भविष्य की तलाश है, और विज्ञान चूंकि मूलतः अतीत की तलाश है। विज्ञान इसी बात की खोज है कि कॉज क्या है, कारण क्या है? और ज्योतिष इसी बात की खोज है कि इफेक्ट क्या होगा, परिणाम क्या होगा? इन दोनों के बीच बड़ा भेद है। लेकिन फिर भी विज्ञान को रोज-रोज अनुभव होता है, और कुछ बातें जो अनहोनी लगती थीं, लगती थीं कभी सही नहीं हो सकतीं, वे सही होती हुई मालूम पड़ती हैं।

 

जैसा मैंने पीछे आपको कहा, अब वैज्ञानिक इसको स्वीकार कर लिए हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्म के साथ बिल्ट-इन अपना व्यक्तित्व लेकर पैदा होता है। इसको पहले वे नहीं मानने को राजी थे। ज्योतिष इसे सदा से कहता रहा है। जैसे समझें एक बीज है, आम का बीज है। आम के बीज के भीतर किसी न किसी रूप में, जब हम आम के बीज को बो देंगे तो जो वृक्ष पैदा होता है, उसका बिल्ट-इन प्रोग्राम होना चाहिए, उसका ब्लू-प्रिंट होना चाहिए। नहीं तो यह आम का बीज बेचारा, न कोई विशेषज्ञों की सलाह लेता है, न किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षा पाता है, यह आम के वृक्ष को कैसे पैदा कर लेता है! फिर इसमें वैसे ही पत्ते लग जाते हैं, फिर इसमें वैसे ही आम लग जाते हैं।

इस बीज की गुठली के भीतर छिपा हुआ कोई पूरा का पूरा प्रोग्राम चाहिए। नहीं तो बिना प्रोग्राम के यह बीज क्या कर पाएगा? इसके भीतर सब मौजूद चाहिए। जो भी वृक्ष में होगा वह कहीं न कहीं छिपा ही होना चाहिए। हमें दिखाई नहीं पड़ता, काट-पीट कर हम देख लेते हैं, कहीं दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन होना तो चाहिए ही। अन्यथा आम के बीज से फिर नीम निकल सकती थी। भूल-चूक हो जाती। लेकिन कभी भूल होती नहीं दिखाई पड़ती। वह आम ही निकल आता है। सब रिपीट हो जाता है, फिर वही पुनरुक्त कर जाता है।

इस छोटे से बीज में अगर सारी की सारी सूचनाएं छिपी हुई नहीं हैं कि इस बीज को क्या करना है--कैसे अंकुरित होना है, कैसे पत्ते, कैसी शाखाएं, कितना बड़ा वृक्ष, कितनी उम्र का वृक्ष, कितना ऊंचा उठेगा--यह सब इसमें छिपा होना चाहिए। कितने फल लगेंगे, कितने मीठे होंगे, पकेंगे कि नहीं पकेंगे--यह सब इसके भीतर छिपा होना चाहिए। अगर आम के बीज के भीतर यह सब छिपा है तो आप जब मां के पेट में आते हैं तो आपके बीज में सब छिपा नहीं होगा?

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 15

 अमेरिका वापसी और हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण  

 

 भारत से  वापसी हुई तो डलास से भी रुख़सत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फ़िलाडेल्फ़िया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका के दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ़ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था। वैसे यह डर बेबुनियाद भी नहीं था। सत्यनारायण अपने बर्फ़ पर कार फिसलने से हुई दुर्घटना और बर्फ़ीले मौसम की मुश्किलों के हाल बता चुके थे। इस बार लेकिन कोई विकल्प नहीं था। दिसंबर का मौसम था और डलास से फ़िलाडेल्फ़िया, सौलह सौ मील लंबा ड्राइव करना संभव नहीं था। इसलिए हवाई यात्रा करते हुए फ़िलाडेल्फ़िया का रुख़ किया। फ़िलाडेल्फ़िया में एक छोटे से उपशहर, जिसे हम यहां सबर्ब कहते हैं, में काम करना और रहना था। जगह का नाम सुन कर विचित्र लगा 'किंग आफ प्रशिया'। हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी से पूछा भी कि यह किंग आफ प्रशिया का नाम किस किंग पर पड़ा पर सभी निरुत्तर थे। इतिहास खंगालने पर भी यही पता चला कि 1851 में किसी सर्वेक्षणकर्ता ने किसी होटल पर किंग आफ प्रशिया लिखा देख कर पूरे कस्बे का नाम यही समझ लिया, अब वह होटल वाला खुद किंग था या प्रशिया से आया था, खुदा जाने।


बांके बिहारी


किंग आफ प्रशिया में आने पर पता चला कि हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण होने जा रहा है। इसमें एक अमेरिकी शामिल हो जाएगा। इस नए मेहमान के आने की तैयारियां शुरू हो गई। एक ऐसे ही शनिवार को नए अमेरिकी के संभावित नाम पर विचार विमर्श चल रहा था। आजकल बच्चों के इतने क्लिष्ट नाम रखे जा रहे हैं जिनको अंग्रेज़ी में 'टांग ट्विस्टर्स' की संज्ञा दी जा सकती है। उस पर तुर्रा यह कि कभी–कभी खुद मां बाप को पता नही होता कि नाम का मतलब क्या है। फिर कई बार एक देश में रखा नाम दूसरे देश में मुसीबत बन जाता है। कुछ अक्षरों का तो अमेरिकन अंग्रेज़ी में वजूद ही नहीं। खुद मेरे नाम में आने वाला 'त' कभी ड कभी ट बना डालते हैं यहां लोग।

हालांकि मेरे एक मित्र वाजिद की तो शामत ही आ गई थी। बेचारे ने बड़े अरमान से अपने जिगर के टुकड़े का नाम फख्र रख दिया। पर हर मेहमान, हर रिश्तेदार उनकी बुद्धि पर तरस खाते हुए उन्हें बच्चे का नाम बदलने की सलाह देने लगा। वाजिद भाई भी अपनी पसंद पर अड़े रहे। पर बच्चे ने स्कूल जाना शुरू करने और समझदार हो जाने पर गदर काट दी कि या तो हमारा नाम बदलो या हमारा स्कूल। देर से ही सही वाजिद भाई को बात समझ में आ गई और तमाम अदालती सरकारी खर्चों के बाद फख्र मियां सलीम बन गए। कुछ ऐसे ही संस्कृति के कीडे. ने हमें काटा और हमें सूझा कि अगर हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो हम उसका नाम बांके बिहारी रखेंगे। न जाने क्यों श्रीमती जी को यह नागवार गुज़रा। उनको केशव–ए–माधव वगैरह नाम पुरातन पंथी लग रहे थे जबकि बांके नाम से गुंडेपन का अहसास हो रहा था। इस मुद्दे पर गंभीर मतभेद हो गए।


बच्चों की बरसात


नए मेहमान के लिए हम सपरिवार 'टवायस आर अस' गए। यहां नवजात शिशुओं के लिए एक सेक्शन ही अलग बना होता है। वहां हमारे सरीखे. कई परिवार ख़रीदारी में लगे थे। ऐसी–ऐसी चीज़ें जो कभी न देखी न सुनी। हमें किंकर्तव्यविमूढ़ देख एक सहायिका ने पूछा कि क्या हम बेबीशावर की योजना बना रहे हैं। इस सवाल पर हम से ज़्यादा हमारी बेटी चकित थी कि भला बच्चों की बरसात कैसे हो सकती है और अगर बच्चे बरसने लगे तो कैसा नज़ारा होगा। इस नए शब्द का मतलब भी जल्द समझ में आ गया, 'बेबी शावर' बहुत कुछ उत्तर भारत में होने वाली गोद भराई की रस्म जैसा उत्सव होता है।

पर यहां आपके घर अनचाहे या एक सरीखे दो तीन उपहार न आ जाए इसके लिए आप अपनी पसंद के किसी स्टोर में अपनी मरज़ी की उपहार सूची चुन कर उसे अपने मित्रों या रिश्तेदारों में ईमेल से वितरित कर देते हैं। लोग उसमें से अपनी पसंद या सामथ्र्य के हिसाब से चुनाव करके भुगतान कर देते हैं और उत्सव वाले दिन सारे सामान आपके घर एकसाथ पहुंच जाते हैं। कुछ ऐसा ही शादी विवाह में भी होता है। अगर ऐसा भारत में भी होता तो हर नवविवाहित को छः घड़ियां, तीन आइसक्रीम सेट, बारह लंचबाक्स और बत्तीस थर्मसों का संग्रहालय न बनाना पड़े।

बताओ डाक्टर ने क्या बताया?


कुछ सप्ताह बाद श्रीमती जी का स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान अल्ट्रासाउंड हो रहा था। अमेरिका में बेटे या बेटियों को लेकर मुझे कोई पूर्वाग्रह नही दिखा। हालांकि अल्ट्रासाउंड में नर्स होने वाले बच्चे का लिंग बता सकती है पर बहुत से दंपत्ति इसे अंत तक नहीं जानना चाहते। बच्चे के मामले में कई विशेषाधिकार मां को प्रदत्त हैं। यही अल्ट्रासाउंड में हुआ, नर्स ने श्रीमती जी से पूछा कि क्या वे जानना चाहेंगी कि होने वाले बच्चे का लिंग क्या है। मारे रोमांच के श्रीमती जी ने नहीं में गर्दन हिला दी। नर्स ने यह जानना चाहा कि क्या वे इस सूचना के अधिकार से मुझे भी वंचित रखना चाहेंगीं। पता नहीं क्यों उन्होने नहीं कर दी। फिर क्या था, नर्स ने श्रीमती जी की आंखे ढंक कर मुझे इशारे से बता दिया कि अस्पताल से बाहर आते ही श्रीमती जी का प्रश्न था, "बताओ डाक्टर ने क्या बताया?" मंैने चहुलबाजी में बहाना टिका दिया कि आप तो रोमांच को रोमांच ही रखना चाहती है अतः इसे रहस्य ही रहने दें। पर उनके पास ब्रह्मास्त्र मौजूद था। उन्होंने दांव फेंका कि चूंकि अमेरिका में हमारे रिश्तेदार वगैरह न होने कि वजह से सारी ख़रीदारी हमें ही करनी होगी और वह भी शिशुआगमन से पहले इसलिए मुझे या तो उन्हें सच बता देना चाहिए या फिर दोहरी ख़रीदारी के लिए तैयार रहना चाहिए।

Go Back

Critical Assessment of Astrology -8

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश - 8 )

 

ज्योतिष कहता यही है कि इस जगत में जो भी घटित होता है उसके कारण हैं। हमें ज्ञात न हों, यह हो सकता है। ज्योतिष यह कहता है कि भविष्य जो भी होगा वह अतीत से विच्छिन्न नहीं हो सकता, उससे जुड़ा हुआ होगा। आप कल जो भी होंगे वह आज का ही जोड़ होगा। आज तक आप जो हैं वह बीते हुए कल का जोड़ है। ज्योतिष बहुत वैज्ञानिक चिंतन है। वह यह कहता है कि भविष्य अतीत से ही निकलेगा। आपका आज कल से निकला है, आपका आने वाला कल आज से निकलेगा। और ज्योतिष यह भी कहता है कि जो कल होने वाला है वह किसी सूक्ष्म अर्थों में आज भी हो जाना चाहिए।

 

अब इसे थोड़ा समझें। अब्राहम लिंकन ने मरने के तीन दिन पहले एक सपना देखा, जिसमें उसने देखा कि उसकी हत्या कर दी गई है और व्हाइट हाउस के एक खास कमरे में उसकी लाश पड़ी हुई है। उसने नंबर भी कमरे का देखा। उसकी नींद खुल गई। वह हंसा, उसने अपनी पत्नी को कहा कि मैंने एक सपना देखा है कि मेरी हत्या कर दी गई है और फलां-फलां नंबर--उसी मकान में तो वह सोया हुआ है व्हाइट हाउस के--इस मकान के फलां नंबर के कमरे में मेरी लाश पड़ी है। मेरे सिरहाने तू खड़ी हुई है और आस-पास फलां-फलां लोग खड़े हुए हैं। हंसी हुई, बात हुई; लिंकन सो गया, पत्नी सो गई। तीन दिन बाद लिंकन की हत्या हुई और उसी नंबर के कमरे में और उसी जगह उसकी लाश तीन दिन बाद पड़ी थी और उसी क्रम में आदमी खड़े थे।

 

अगर तीन दिन बाद जो होने वाला है वह किसी अर्थों में आज ही न हो गया हो तो उसका सपना कैसे निर्मित हो सकता है? उसकी सपने में झलक भी कैसे मिल सकती है? सपने में झलक तो उसी बात की मिल सकती है जो किसी अर्थ में अभी भी कहीं मौजूद हो। तो हम उसकी एक ग्लिम्प्स, खिड़की खोलें और हमें दिखाई पड़ जाए। लेकिन खिड़की के बाहर मौजूद हो! लेकिन कहीं मौजूद हो।

 

ज्योतिष का मानना है कि भविष्य हमारा अज्ञान है इसलिए भविष्य है। अगर हमें ज्ञान हो तो भविष्य जैसी कोई घटना नहीं है। वह अभी भी कहीं मौजूद है।


महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, और जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के सामने ही महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और पांच सौ महावीर के मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से।


महावीर कहते थे, जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया। जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए। अगर आप बूढ़े हो रहे हैं तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए। महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है, वह हो ही गया।

 

महावीर का एक शिष्य वर्षाकाल में महावीर से दूर था, बीमार था। उसने अपने एक शिष्य को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्य को खयाल आया कि ठहरो, महावीर कहते हैं--जो हो रहा है वह हो ही गया! तू आधे में रुक जा! चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गई--रुक जा! उसे अचानक खयाल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हैं। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई! उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौट कर वर्षाकाल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते हैं कि जो हो रहा है वह हो ही गया! क्योंकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है--खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई! तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं।

 

महावीर ने उससे जो कहा, वह नहीं समझ पाया होगा, क्योंकि वह बहुत बाल-बुद्धि का रहा होगा, अन्यथा ऐसी बात लेकर नहीं आता। महावीर ने कहा, तूने रोका, रोक ही रहा था, और रुक ही गया! वह जो चटाई तू रोका, रोक रहा था, रुक गया! तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी, एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गई! और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी? खुलनी शुरू हो गई है, खुल ही जाएगी। तू लौट कर जा! वह जब लौट कर गया तो देखा, एक आदमी खोल कर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया।

 

महावीर जब यह कहते थे कि जो हो रहा है वह हो ही गया, तो वे यह कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्य है। कली खिल रही है--खिल ही गई--खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्य में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है, अभी तो कली ही है, लेकिन जब खिल ही रही है तो खिल जाएगी। उसका खिल जाना भी कहीं घटित हो गया।
अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा।

 

हम सदा अतीत से देखते हैं। कली खिल रही है। हमारा जो चिंतन है, आमतौर से वह पास्ट ओरिएंटेड है, वह अतीत से बंधा है। कहते हैं, कली खिल रही है, फूल की तरफ जा रही है, कली फूल बनेगी। लेकिन इससे उलटा भी हो सकता है! यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्का दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है, कोई आपको आगे से खींच रहा है। गति दोनों तरह हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्का दे रहा हूं, आप आगे जा रहे हैं। ऐसा भी हो सकता है, कोई आपको आगे से खींच रहा है, पीछे से कोई धक्का नहीं दे रहा है, और आप आगे जा रहे हैं।

 

ज्योतिष का मानना है कि यह अधूरी दृष्टि है कि अतीत धक्का दे रहा है और भविष्य हो रहा है। पूरी दृष्टि यह है कि अतीत धक्का दे रहा है और भविष्य खींच रहा है। कली फूल बन रही है, इतना ही नहीं; फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार भी रहा है, खींच भी रहा है! अतीत पीछे है, भविष्य आगे है, अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्का दे रहा है, खुल जाओ! पूरा भविष्य आवाहन दे रहा है, खुल जाओ! अतीत और भविष्य दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी। अगर कोई भविष्य न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्योंकि भविष्य में अवकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्य में जगह चाहिए, स्पेस चाहिए। भविष्य स्थान दे तो ही कली फूल बन पाएगी।

 

अगर कोई भविष्य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धकाए--मैं आपको पीछे से कितना ही धक्का दूं, लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊंगा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्का दूं और आगे की जगह आपको स्वीकार कर ले, आमंत्रण दे दे कि आ जाओ, अतिथि बना ले, तो ही मेरा धक्का सार्थक हो पाए। मेरे धक्के के लिए भविष्य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है, भविष्य जगह देता है।

 

ज्योतिष की दृष्टि यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्टि अधूरी है, आधी वैज्ञानिक है! भविष्य पूरे वक्त पुकार रहा है, पूरे वक्त खींच रहा है। हमें पता नहीं है, हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आंख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते। हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

 

कृष्णमूर्ति की जन्मकुंडली देखें कभी तो हैरान होंगे। अगर एनी बीसेंट ने और लीड बीटर ने फिक्र की होती और कृष्णमूर्ति की जन्मकुंडली देख ली होती तो भूल कर भी कृष्णमूर्ति के साथ मेहनत नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि जन्मकुंडली में साफ है बात कि कृष्णमूर्ति जिस संगठन से संबंधित होंगे, उस संगठन को नष्ट करने वाले होंगे; जिस संस्था से संबंधित होंगे, उस संस्था को विसर्जित करवा देंगे; जिस संगठन के सदस्य बनेंगे, वह संगठन मर जाएगा।

 

लेकिन एनी बीसेंट भी मानने को तैयार नहीं होती। कोई सोच भी नहीं सकता था। लेकिन हुआ यही। थियोसाफी ने उन्हें खड़ा करने की कोशिश की। थियोसाफी को उनकी वजह से इतना धक्का लगा कि वह सदा के लिए मर गया आंदोलन। फिर एनी बीसेंट ने "स्टार ऑफ दि ईस्ट' नाम की बड़ी संस्था खड़ी की। फिर एक दिन कृष्णमूर्ति उस संस्था को विसर्जित करके अलग हो गए। एनी बीसेंट ने पूरा जीवन उस संस्था को खड़ा करने में समर्पित किया और नष्ट किया अपने को।

 

लेकिन उसमें कृष्णमूर्ति का भी कुछ बहुत हाथ नहीं है। वे जिन नक्षत्रों की छाया में पैदा हुए हैं उन नक्षत्रों की सीधी सूचना है कि वे किसी संस्था में भी डिस्ट्रक्टिव सिद्ध होंगे। किसी भी संस्था के भीतर वे विघटनकारी सिद्ध होंगे।

 

भविष्य एकदम अनिश्चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्चित है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्य में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे हैं। भविष्य का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते हैं कि निश्चित नहीं है। लेकिन भविष्य में दिखाई पड़ने लगे...और ज्योतिष भविष्य में देखने की प्रक्रिया है!

 

तो ज्योतिष सिर्फ इतनी ही बात नहीं है कि ग्रह-नक्षत्र क्या कहते हैं? उनकी गणना क्या कहती है? यह तो सिर्फ ज्योतिष का एक डायमेंशन, एक आयाम है। फिर भविष्य को जानने के और आयाम भी हैं। मनुष्य के हाथ पर खिंची हुई रेखाएं हैं, मनुष्य के माथे पर खिंची हुई रेखाएं हैं, मनुष्य के पैर पर खिंची हुई रेखाएं हैं। पर ये भी बहुत ऊपरी हैं। मनुष्य के शरीर में छिपे हुए चक्र हैं। उन सब चक्रों का अलग-अलग संवेदन है। उन सब चक्रों की प्रतिपल अलग-अलग गति है, फ्रीक्वेंसी है। उनकी जांच है। मनुष्य के पास छिपा हुआ अतीत का पूरा संस्कार-बीज है। 

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 14

पागल कौन?


एक रात में मेरे चाचाश्री का फ़ोन आया। वे मिर्ज़ापुर के पास किसी फैक्ट्री में सहायक जनरल मैनेजर हैं। चाचाश्री कानपुर न आ पाने का कारण बता रहे थे। कारण सुन कर सब हंस–हंस कर दोहरे हो गए।

चाचाश्री की फैक्ट्री में कोई गार्ड था संतराम। किसी मानसिक परेशानी के चलते उसका दिमाग़ फिर गया और वह फैक्ट्री में तोड़फोड़ करने लगा। चाचाश्री ने संतराम को दो चौकीदारों के साथ फैक्ट्री के डाक्टर का सिफ़ारशी पत्र देकर रांची मानसिक चिकित्सालय ले जाकर भर्ती कराने का आदेश दिया। चाचाश्री ने दोनों को निर्देश दिया था कि रांची पहुंच कर वहां के डाक्टर से बात करवा दें।

अगले रविवार को चाचाश्री को कानपुर आना था। पर न जाने क्यों दोनों चौकीदारों का रांची पहुंच कर कोई फ़ोन नहीं आया। चाचाश्री दोनों चौकीदारों की गै.रज़िम्मेदारी को लानतें भेजते हुऐ शनिवार को सो गए। रात में बंगले के दरवाज़े की घंटी बजी। चाचाश्री ने लाईट खोल कर देखा तो संतराम खड़ा था। चाची की चीख निकलते–निकलते बची। चाचाश्री ने चाची को संयत रहने का इशारा किया। चाचाश्री ने देखा संतराम फिलहाल तो सामान्य लग रहा था। उसने चाचाश्री को हाथ जोड़कर नमस्कार भी किया। चाचाश्री ने उसे वहीं बैठने को कहा और खुद यथासंभव दिखने की कोशिश करते हुए उससे दस फुट दूर सोफे पर बैठ गए। अब पागल का क्या भरोसा, कहीं हमला ही कर दे। चाचाश्री सोच रहे थे कि शायद यह उन दोनों चौकीदारों से निगाह बचाकर भाग आया है और वे दोनों चौकीदार या तो इसे ढू.ंढ़ रहे होंगे या फिर मारे डर के वापस ही नही आए। उसी उधेड़बुन में चाचाश्री ने संतराम से पूछा,


चाचाश्री : कहो संतराम कैसे हो?
संतराम : जी साहब, दया है आपकी।
चाचाश्री : अकेले आए हो?
संतराम : जी साहब।
चाचाश्री : वह दोनों कहां हैं?
संतराम : कौन साहब?
चाचाश्री : अरे दोनों चौकीदार, जो तुम्हारे साथ रांची गए थे?
संतराम : साहब, उन दोनों को मैं भर्ती करा आया।
चाचाश्री कुर्सी से उछलते हुए : क्या!
संतराम : जी साहब, कल भर्ती कराया था, अगली ट्रेन पकड़ कर मैं डयूटी पर टैम से वापस आ गया।


चाचाश्री ने संतराम को चाय पिलाने के लिए इंतज़ार करने को कहकर दूसरे कमरे में फ़ोन करने आ गए। चाची संतराम पर निगाह रखे थीं। संतराम बिल्कुल सामान्य दिख रहा था। चाचाश्री ने रांची मानसिक चिकित्सालय फ़ोन मिलाया तो सुपरवाईज़र ने बताया कि उनकी फैक्ट्री से एक चौकीदार दो पागलों को भर्ती करा गया है। भर्ती के दिन से दोनों ने बवाल मचा रखा है और रह रह कर दोनों आसमान सर पर उठा लेते हैं। चाचाश्री ने सुपरवाईज़र को बड़ी मुश्किल से यकीन दिलाया कि उसने पागल को छोड़कर दो भलेमानुषों को भर्ती कर लिया है। चाचाश्री ने अबकी बार छः चौकीदारों को संतराम के साथ रांची भेजा। इस बार संतराम को भर्ती कराने में कोई बखेड़ा नहीं हुआ। पिछली बार गए दोनों चौकीदार वापस आते ही चाचाश्री के पैरों में लौटकर रोने लगे और दुहाई मांगने लगे कि आगे से उन्हें किसी पागल के साथ न भेजें। दोनों ने रांची की कहानी सुनाई।


दोनों चौकीदारों के साथ संतराम बिल्कुल मोम के पुतले की तरह शांत बैठे बैठै रांची तक गया। दोनों ने उसे रिक्शे के बीच बैठाल कर स्टेशन से मानसिक चिकित्सालय ले जाने लगे। मानसिक चिकित्सालय का गेट पास आते ही संतराम रिक्शे से कूदकर भागा और चिकित्सालय के अंदर घुस गया। उसे जो भी पहला डाक्टर दिखा उसके पैर पकड़ कर वह ज़ोर–ज़ोर से रोने लगा। उसने चिल्ला चिल्ला कर कर कहा कि उसे दो पागलों ने घेर लिया है और उसे बाहर बहुत मार रहे हैं।

यह सुनकर डाक्टर ने चार वार्ड ब्वाय बाहर भेजे जहां वाकई दोनों चौकीदार चिकित्सालय की ओर बदहवास से भागे आ रहे थे। वार्ड ब्वायज़ यहीं समझे कि दोनों वाकई पागल हैं और संतराम को ढूंढ़ रहे हैं। दोनों चौकीदारों को जबरदस्ती हवा में टांग के डाक्टर के सामने लाया गया। दोनों खुद को छु.ड़ाने के लिए गुल गपाड़ा मचाए थे और संतराम को पागल बता रहे थे। डाक्टर ने उन्हें डपट कर कहा कि हर पागल खुद को समझदार और दूसरों को पागल कहता है। यह सुनकर चौकीदार वार्डब्वायज़ को पागल बताने लगे। दोनों को बांधने के लिए वार्ड ब्वायज को उन्हें थोड़ा बहुत पीटना भी पड़ा। ज़्यादा हंगामा करने पर उन्हें बेहोशी के इंजेक्शन ठोंक दिए गए। संतराम जी तो उन्हें शान से भर्ती कराकर मिर्ज़ापुर चल दिए, पर वार्डब्वायज़ की पिटाई से उन बेचारे चौकीदारों के शरीर के सारे जोड़ खुल गए।

Go Back

Critical Assessment of Astrology -7

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश - 7 )

 हजारों-लाखों पक्षी हर साल यात्रा करते हैं हजारों मील की। सर्दियां आने वाली हैं, बर्फ पड़ेगी, तो बर्फ के इलाके से पक्षी उड़ना शुरू हो जाएंगे। हजारों मील दूर किसी दूसरी जगह वे पड़ाव डालेंगे। वहां तक पहुंचने में अभी उन्हें दो महीने लगेंगे, महीना भर लगेगा। अभी बर्फ गिरनी शुरू नहीं हुई, महीने भर बाद गिरेगी। ये पक्षी कैसे हिसाब लगाते हैं कि अब महीने भर बाद बर्फ गिरेगी? क्योंकि अभी हमारी मौसम को बताने वाली जो वेधशालाएं हैं वे भी पक्की खबर नहीं दे पाती हैं। मैंने तो सुना है कि कुछ मौसम की खबर देने वाले लोग पहले ज्योतिषियों से पूछ जाते हैं सड़कों पर बैठे हुए कि आज क्या खयाल है--पानी गिरेगा कि नहीं?

आदमी ने अभी जो-जो व्यवस्था की है वह बचकानी मालूम पड़ती है। ये पक्षी एक-डेढ़ महीने, दो महीने पहले पता करते हैं कि अब बर्फ कब गिरेगी। और हजारों प्रयोग करके देख लिया गया है कि जिस दिन पक्षी उड़ते हैं, हर पक्षी की जाति का निश्चित दिन है। हर वर्ष बदल जाता है वह निश्चित दिन, क्योंकि बर्फ का कोई ठिकाना नहीं है। लेकिन हर पक्षी का तय है कि वह बर्फ गिरने के एक महीने पहले उड़ेगा, तो हर वर्ष वह एक महीने पहले उड़ता है। बर्फ दस दिन बाद गिरे तो वह दस दिन बाद उड़ता है; बर्फ दस दिन पहले गिरे तो वह दस दिन पहले उड़ता है। यह बर्फ के गिरने का कुछ निश्चय तो नहीं है, ये पक्षी कैसे उड़ जाते हैं महीने भर पहले पता लगा कर?

 

जापान में एक चिड़िया होती है जो भूकंप आने के चौबीस घंटे पहले गांव खाली कर देती है। साधारण गांव की चिड़िया है। हर गांव में बहुत होती हैं। भूकंप आने के चौबीस घंटे पहले चिड़िया गांव खाली कर देती है। अभी भी वैज्ञानिक दो घंटे के पहले भूकंप का पता नहीं लगा पाते। और दो घंटे पहले भी अनसर्टेंटी होती है, पक्का नहीं होता है। सिर्फ प्रोबेबिलिटी होती है, संभावना होती है कि भूकंप हो सकता है। लेकिन चौबीस घंटे पहले! तो जापान में तो भूकंप का फौरन पता चल जाता है। जिस गांव से चिड़िया उड़ जाती है उस गांव के लोग समझ जाते हैं कि भाग जाओ। चौबीस घंटे का वक्त है, वह चिड़िया हट गई है, गांव में दिखाई नहीं पड़ती। इस चिड़िया को कैसे पता चलता होगा?

 

वैज्ञानिक अभी दस वर्षों में एक नयी बात कह रहे हैं और वह यह कि प्रत्येक प्राणी के पास कोई ऐसी अंतर-इंद्रिय है जो जागतिक प्रभावों को अनुभव करती है। शायद मनुष्य के पास भी है, लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धिमानी में उसे खोया है। मनुष्य अकेला प्राणी है जगत में जिसके पास बहुत सी चीजें हैं जो उसने बुद्धिमानी में खो दी हैं; और बहुत सी चीजें जो उसके पास नहीं थीं उसने बुद्धिमानी में उनको पैदा करके खतरा मोल ले लिया है। जो है उसे खो दिया है, जो नहीं है उसे बना लिया है।

 

लेकिन छोटे से छोटे प्राणी के पास भी कुछ संवेदना के अंतर-स्रोत हैं। और अब इसके लिए वैज्ञानिक आधार मिलने शुरू हो गए हैं कि अंतर-स्रोत हैं। ये अंतर-स्रोत इस बात की खबर लाते हैं कि इस पृथ्वी पर जो जीवन है वह आइसोलेटेड नहीं है, वह सारे ब्रह्मांड से संयुक्त है। और कहीं भी कुछ घटना घटती है तो उसके परिणाम यहां होने शुरू हो जाते हैं।


जैसा मैं आपसे कह रहा था पैरासेलीसस के संबंध में, आधुनिक चिकित्सक भी इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि जब भी सूर्य पर...सूर्य पर अनेक बार धब्बे प्रकट होते हैं। ऐसे भी सूर्य पर कुछ धब्बे, डाट्स, स्पाट्स होते हैं। कभी वे बढ़ जाते हैं, कभी वे कम हो जाते हैं। जब सूर्य पर स्पाट्स बढ़ जाते हैं तो जमीन पर बीमारियां बढ़ जाती हैं। और जब सूर्य पर स्पाट्स कम हो जाते हैं तो जमीन पर बीमारियां कम हो जाती हैं। और जमीन से हम बीमारियां कभी न मिटा सकेंगे, जब तक सूर्य के स्पाट्स कायम हैं।

 

हर ग्यारह वर्ष में सूरज पर भारी उत्पात होता है, बड़े विस्फोट होते हैं। और जब ग्यारह वर्ष में सूरज पर विस्फोट होते हैं और उत्पात होते हैं तो पृथ्वी पर युद्ध और उत्पात होते हैं। पृथ्वी पर युद्धों का जो क्रम है वह हर दस वर्ष का है। महामारियों का जो क्रम है वह दस और ग्यारह वर्ष के बीच का है। क्रांतियों का जो क्रम है वह दस और ग्यारह वर्ष के बीच का है।


एक बार खयाल में आना शुरू हो जाए कि हम अलग और पृथक नहीं हैं, संयुक्त हैं, आर्गेनिक हैं, तो फिर ज्योतिष को समझना आसान हो जाएगा। इसलिए मैं ये सारी बातें आपसे कह रहा हूं। कुछ आदमी को ऐसा खयाल पैदा हो गया था--अब भी है--कि ज्योतिष एक सुपरस्टीशन, एक अंधविश्वास है। बहुत दूर तक यह बात सच भी मालूम पड़ती है। असल में वही चीज अंधविश्वास मालूम पड़ने लगती है जिसके पीछे हम वैज्ञानिक कारण बताने में असमर्थ हो जाएं। वैसे ज्योतिष बहुत वैज्ञानिक है। और विज्ञान का अर्थ ही होता है कि कॉज और एफेक्ट के बीच, कार्य और कारण के बीच संबंध की तलाश!

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 13

 

  

अरोड़ा जी अपने इन्जीनियरिंग कालेज़ ( HBTI ,Kanpur ) में

 

एक दिन सोचा कि अपने इंजीनियरिंग कालेज के दर्शन ही कर लिए जाएं। थोड़ी ही देर में एचबीटीआई के निदेशक के केबिन के बाहर था। उन दिनों डा .वी के जैन निदेशक थे। केबिन के बाहर उनके सचिव और एक दो क्लर्क बैठे थे। डा . जैन के बारे में पूछते ही रटा रटाया जवाब मिला 'डायरेक्टर साहब अभी ज़रूरी मीटिंग कर रहे हैं, दो घंटे के बाद आइए।' पता नही इन क्लर्कों की आदत होती है या इन्हें निर्देश होतें है कि हर ऐरे गैरे को घुसने से रोकने के लिए मीटिंग का डंडा इस्तेमाल किया जाए। सचिव ने पूछ लिया 'कहां से आए हैं, मैंने जब डलास कहा तो उसने मुझे अंदर जाने का इशारा कर दिया। मतलब कि मीटिंग के दौरान नोएंट्री का बोर्ड सिर्फ़ स्वदेशियों के लिए ही होता है।

डा .जैन अंदर किसी से बात ही कर रहे थे। देखते ही पहचान गए। हज़ारों विद्यार्थियों के नाम और शक्ल याद रख सकने की उनकी क्षमता विलक्षण है। कुछ देर तक वे बड़ी आत्मीयता से हालचाल लेते रहे। तभी कुछ सचिव और एक दो प्रोफ़ेसर जिन्हे मैं नहीं जानता था फाइलें लिए अंदर आए। मैंने चलने की अनुमति चाही तो डा .जैन ने मुझसे बैठे रहने को कहा। बाकी सबको बैठने को कहकर उन्होंने मेरा परिचय सबको यह कहकर दिया कि ये डलास से आए हैं, वहीं काम करते हैं। मैं अभी यही सोच रहा था कि डा .जैन ने मेरा परिचय एचबीटीआई के पूर्व छात्र के रूप में क्यों नही दिया।


तभी डा .जैन मुझसे मुख़ातिब हुए और एक सवाल दाग दिया 'अतुल, यह बताओ कि अगर मेरे पास दस लाख रुपये हो और मुझे एचबीटीआई के कंप्यूटर सेक्शन के लिए कंप्यूटर ख़रीदने हो तो मुझे दो विकल्पों में क्या चुनना चाहिए, पचास हज़ार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर या फिर पांच–पांच लाख के दो एडवांस वर्कस्टेशन। 'मैनें सीधे बेलौस राय जाहिर कर दी 'पचास हज़ार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर लेने चाहिए।' डा .जैन के सामने बैठी मंडली में से कुछ लोग कसमसाए और उनमें कोई कुछ बोलने को हुआ कि तभी डा .जैन ने अगला सवाल दागा 'क्यों?' मैं सोच रहा था कि डा .जैन की आख़िर मंशा क्या है और यह समिति किस बात की मीटिंग कर रही है। पर चूंकि मैं डा .जैन के भूतपूर्व छात्र की हैसियत से वहां गया था इसलिए मैंने समग्र जवाब देना उचित समझा। मैंने कहा, 'सर, अगर कोई मशीन या पुल डिजाईन का कोर्स नही चलाना है इनपर तो डेस्कटाप ही ठीक रहेंगे, जिन एप्लीकेशन पर हम काम करते हैं वही यहां सिखाई जानी चाहिए। जो अभी भी यहां नहीं हैं और उन एप्लीकेशन के लिए डेस्कटाप की क्षमता काफ़ी है। उससे कम से कम एकबार में चालीस छात्रों का भला होगा। अगर आप दो कंप्यूटर ले लेंगे तो एकबार में ज़्यादा से ज़्यादा चार लोग ही उसे उपयोग कर सकेंगे। यह वर्कस्टेशन की क्षमता के साथ नाइंसाफ़ी और पैसे की बर्बादी होगी।'

डा .जैन ने मुड़कर बाकी लोगों पर कटाक्ष रूपी प्रश्न किया, 'सुना आपने, यह राय एक अमेरिका में काम कर रहे इंजीनियर की है, यही राय मैं दे रहा था तो आप सब मुझे बेवकूफ़ समझ रहे थे और कह रहे थे कि मैं बाबा आदम के ज़माने की तकनीकी पर भरोसा कर रहा हूं।' मैंने वहां वाकयुद्ध छिड़ने से पहले फूटने में भलाई समझी। बाद मे पता चला कि अंदर बैठे लोग कंप्यूटर ख़रीद समिति के सदस्य थे और उन लोगो में ख़रीदे जाने वाले कंप्यूटरों की क्षमता को लेकर मतभेद थे। डा .जैन जानते थे कि उनकी व्यवहारिक सलाह को लोग दकियानूसी समझ रहे थे पर जब उसी सलाह पर अमेरिकी स्वीकृती का मुलम्मा चढ़ गया तो वह काम की बात हो गई।

आपकी स्कूटर पर नंबर तो यूपी का है


अमेरिका में ट्रैफ़िक सिग्नल स्वचालित हैं। इसलिए यहां भारत की तरह चौराहे के बीच न तो मुच्छाड़ियल ट्रैफ़िक पुलिसवाला दिखता है न उसके के खड़े होने के लिए बनी छतरी। कभी कभी किसी समारोह वगैरह में या फिर सड़क निर्माण की दशा में ट्रैफ़िक नियंत्रित करने के लिए आम पुलिसवाले या पुलिसवालियां ही ट्रैफ़िक नियंत्रित करते हैं। पुलिसवालियां तो खै.र पुलिसवालियों जैसी ही दिखती हैं, पुलिसवाले भी कम स्मार्ट नहीं दिखते। केडीगुरू का मानना है कि इन पुलिसवालों की भर्ती के पहले ब्यूटी कांटेस्ट ज़रूर होता होगा। मैंने भी आजतक एक भी तोंदियल पुलिसवाला नहीं देखा अमेरिका में। खै.र फोटोग्राफ़ी का नया शौक चर्राया था, जेब में कैमरा था और हैलट हास्पिटल के चौराहे पर सफ़ेद वर्दी में एक ट्रैफ़िक हवलदार को देखकर उसकी फ़ोटो लेने की सूझी।

पर यह उतना आसान नही निकला जितना सोचा था। ट्रैफ़िक हवलदार बड़ा नखरीला निकला। पहले पंद्रह मिनट तक उसे यही शक बना रहा कि मैं शायद किसी मैगज़ीन या अख़बार से हूं और किसी लेख वगैरह में पुलिस की बुराई करने वाला हूं और उस हवलदार की फ़ोटो अपने लेख के लिए उपयोग कर लूंगा। वैसे पुलिसवालों की छवि कैसी है यह बताने की ज़रूरत नहीं पर उस वक्त वह दरोगा वाकई काम ही कर रहा था, वसूली नहीं। पर उसे यह कतई हजम नहीं हो रहा था कि कोई भलामानुष अपने व्यक्तिगत एलबम के लिए किसी मुच्छाड़ियल पुलिसवाले की फ़ोटो भला क्यों लेना चाहेगा। फिर से अमेरिका का तमगा चमकाना पड़ा। पर जो सवाल उस दरोगा ने किया उसकी उम्मीद बिल्कुल नही थी। उसने पूछा 'आप कह रहे हैं कि आप अमेरिका में रहते हैं पर आपकी स्कूटर पर नंबर तो यूपी का है।' मैं सोच रहा था कि पुलिसवालों की भर्ती के पहले जनरल नालेज का टेस्ट नही होता क्या।

 

 

Go Back

Critical Assessment of Astrology -6

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश - 6 )

 

प्रोफेसर ब्राउन ने एक अध्ययन किया है। वह खुद ज्योतिष में विश्वासी आदमी नहीं थे; अविश्वासी थे; और अपने पिछले लेखों में उन्होंने बहुत मजाक उड़ाई है। लेकिन पीछे उन्होंने सिर्फ खोजबीन के लिए एक काम शुरू किया, कि मिलिट्री के बड़े-बड़े जनरल्स की उन्होंने जन्मकुंडलियां इकट्ठी कीं--डाक्टर्स की, अलग-अलग प्रोफेशंस की। बड़ी मुश्किल में पड़ गए इकट्ठी करके। क्योंकि पाया कि प्रत्येक प्रोफेशन के आदमी एक विशेष ग्रह में पैदा होते हैं, एक विशेष नक्षत्र-स्थिति में पैदा होते हैं।

 

जैसे जितने भी बड़े प्रसिद्ध जनरल्स हैं, मिलिट्री के सेनापति हैं, योद्धा हैं, उनके जीवन में मंगल का भारी प्रभाव है। वही प्रभाव प्रोफेसर्स की जिंदगी में बिलकुल नहीं है। ब्राउन ने जो अध्ययन किया कोई पचास हजार व्यक्तियों का, जो भी सेनापति हैं उनके जीवन में मंगल का प्रभाव भारी है। आमतौर से जब वे पैदा होते हैं तब मंगल जन्म ले रहा होता है। उनके जन्म की घड़ी मंगल के जन्म की घड़ी होती है। ठीक उससे विपरीत जितने पैसिफिस्ट हैं दुनिया में, जितने शांतिवादी हैं, वे कभी मंगल के जन्म के साथ पैदा नहीं होते। एकाध मामले में यह संयोग हो सकता है, लेकिन लाखों मामलों में संयोग नहीं हो सकता। गणितज्ञ एक खास नक्षत्र में पैदा होते हैं, कवि उस नक्षत्र में कभी पैदा नहीं होते। कवि उस नक्षत्र में कभी पैदा नहीं होते! यह कभी एकाध के मामले में संयोग हो सकता है, लेकिन बड़े पैमाने पर संयोग नहीं हो सकता।

 

असल में कवि के ढंग और गणितज्ञ के ढंग में इतना भेद है कि उनके जन्म के क्षण में भेद होना ही चाहिए। ब्राउन ने कोई दस अलग-अलग व्यवसाय के लोगों का, जिनके बीच तीव्र फासले हैं, जैसे कवि है और गणितज्ञ है; या युद्धखोर सेनापति है और एक शांतिवादी बर्ट्रेंड रसल है; एक आदमी जो कहता है विश्व में शांति होनी चाहिए और एक आदमी नीत्से जैसा, जो कहता है जिस दिन युद्ध न होंगे उस दिन दुनिया में कोई अर्थ न रह जाएगा; इनके बीच बौद्धिक विवाद ही है सिर्फ या नक्षत्रों का भी विवाद है? इनके बीच केवल बौद्धिक फासले हैं या इनकी जन्म की घड़ी भी हाथ बंटाती है?

 

जितना अध्ययन बढ़ता जाता है उतना ही पता चलता है कि प्रत्येक आदमी जन्म के साथ विशेष क्षमताओं की सूचना देता है। ज्योतिष के साधारण जानकार कहते हैं कि वह इसलिए ऐसा करता है क्योंकि वह विशेष नक्षत्रों की व्यवस्था में पैदा हुआ है। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि वह विशेष नक्षत्रों में पैदा होने को उसने चुना। वह जैसा होना चाह सकता था, जो उसके होने की आंतरिक संभावना थी, जो उसके पिछले जन्मों का पूरा का पूरा रूप था, जो उसकी संयोजित अर्जित चेतना थी, वह इस नक्षत्र में ही पैदा होगी।
हर बच्चा, हर आने वाला नया जीवन इनसिस्ट करता है अपनी घड़ी के लिए, अपनी घड़ी में ही पैदा होना चाहता है, अपनी ही घड़ी में गर्भाधान लेना चाहता है--दोनों अन्योन्याश्रित हैं, इंटर डिपेंडेंट हैं।

मैंने आपसे कहा कि जैसे समुद्र का पानी प्रभावित होता है, सारा जीवन पानी से निर्मित है। पानी के बिना कोई जीवन की संभावना नहीं है। इसलिए यूनान में पुराने दार्शनिक कहते थे, पानी से जीवन! या पुरानी भारतीय और चीनी और दूसरी दुनिया की माइथोलाजीस भी कहती हैं, पानी से जीवन का जन्म! आज इवोल्यूशन को मानने वाले, विकास को मानने वाले वैज्ञानिक भी कहते हैं कि जीवन का जन्म पानी से है। शायद पहला जीवन काई, वह जो पानी पर जम जाती है, वही जीवन का पहला रूप है, फिर आदमी तक विकास। जो लोग पानी के ऊपर गहन शोध करते हैं, वे कहते हैं, पानी सर्वाधिक रहस्यमय तत्व है। और जगत से, अंतरिक्ष से तारों का जो भी प्रभाव आदमी तक पहुंचता है उसमें मीडियम, माध्यम पानी है। आदमी के शरीर के जल को ही प्रभावित करके कोई भी रेडिएशन, कोई भी विकीर्णन मनुष्य में प्रवेश करता है।

जल पर बहुत काम हो रहा है और जल के बहुत से मिस्टीरियस, रहस्यमय गुण खयाल में आ रहे हैं। सर्वाधिक रहस्यमय गुण तो जल का जो खयाल में अभी दस वर्षों में वैज्ञानिकों को आया है वह यह है कि सर्वाधिक संवेदनशीलता जल के पास है, सबसे ज्यादा सेंसिटिव है। और हमारे जीवन में चारों ओर से जो भी इनफ्लुएंस गति करता है भीतर वह जल को ही कंपित करके गति करता है। हमारा जल ही सबसे पहले प्रभावित होता है। और एक बार हमारा जल प्रभावित हुआ तो फिर हमारा प्रभावित होने से बचना बहुत कठिन हो जाएगा।


मां के पेट में बच्चा जब तैरता है, तब भी आप जान कर हैरान होंगे कि वह ठीक ऐसे ही तैरता है जैसे सागर के जल में। और मां के पेट में जिस जल में बच्चा तैरता है उसमें भी नमक का वही अनुपात होता है जो सागर के जल में है। और मां के शरीर से जो-जो प्रभाव बच्चे तक पहुंचते हैं उनमें कोई सीधा संबंध नहीं होता। यह जान कर आप हैरान होंगे कि मां और उसके पेट में बनने वाले गर्भ का कोई सीधा संबंध नहीं होता, दोनों के बीच में जल है और मां से जो भी प्रभाव पहुंचते हैं बच्चे तक वे जल के ही माध्यम से पहुंचते हैं। सीधा कोई संबंध नहीं होता। फिर जीवन भर भी हमारे शरीर में जल का वही काम है जो सागर में काम है।

सागर में बहुत सी मछलियों का अध्ययन किया गया है। ऐसी मछलियां हैं, जो जब सागर का पूर उतार पर होता है, जब सागर उतरता है, तभी सागर के तट पर आकर अंडे रख जाती हैं। सागर उतर रहा है वापस। मछलियां रेत में आएंगी सागर की लहरों पर सवार होकर, अंडे देंगी, सागर की लहरों पर वापस लौट जाएंगी। पंद्रह दिन में सागर की लहरें फिर उस जगह आएंगी, तब तक अंडे फूट कर उनके चूजे बाहर आ गए होंगे, आने वाली लहरें उन चूजों को वापस सागर में ले जाएंगी।

जिन वैज्ञानिकों ने इन मछलियों का अध्ययन किया है वे बड़े हैरान हुए हैं। क्योंकि मछलियां सदा ही उस समय अंडे देने आती हैं जब सागर का तूफान उतरता होता है। अगर वे चढ़ते तूफान में अंडे दे दें तो अंडे तो तूफान में बह जाएंगे। वे अंडे तभी देती हैं जब तूफान उतरता होता है, एक-एक स्टेप सागर की लहरें पीछे हटती जाती हैं। वे जहां अंडे देती हैं वहां लहर दुबारा नहीं आती फिर, नहीं तो लहर अंडे बहा ले जाएगी। वैज्ञानिक बहुत परेशान रहे हैं कि इन मछलियों को कैसे पता चलता है कि सागर अब उतरेगा? सागर के उतरने की घड़ी आ गई? क्योंकि जरा सी भी भूल-चूक समय की, और अंडे तो सब बह जाएंगे! और उन्होंने भूल-चूक कभी नहीं की लाखों साल में, नहीं तो वे खत्म हो गई होतीं मछलियां। उन्होंने कभी भूल की ही नहीं।

पर इन मछलियों के पास क्या उपाय है जिनसे ये जान पाती हैं? इनके पास कौन सी इंद्रिय है जो इनको बताती है कि अब सागर उतरेगा? लाखों मछलियां एक क्षण में पूरे किनारे पर इकट्ठी हो जाएंगी। इनके पास जरूर कोई संकेत-लिपि, इनके पास कोई सूचना का यंत्र होना ही चाहिए। करोड़ों मछलियां दूर-दूर हजारों मील के सागरत्तट पर इकट्ठी होकर अंडे रख जाएंगी एक खास घड़ी में।

जो अध्ययन करते हैं, वे कहते हैं कि चांद के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। चांद से इनको जो संवेदनाएं मिलती हैं, मछलियों को उन संवेदनाओं से पता चलता है कि कब उतार पर, कब चढ़ाव पर। चांद से जो उन्हें धक्के मिलते हैं, उन्हीं धक्कों के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है कि उनको पता चल जाए।

 

यह भी हो सकता है--कुछ का खयाल था--कि सागर की लहरों से ही कुछ पता चलता होगा। तो वैज्ञानिकों ने इन मछलियों को ऐसी जगह रखा जहां सागर की लहर ही नहीं है। झील पर रखा, अंधेरे कमरों में पानी में रखा। लेकिन बड़ी हैरानी की बात है। जब चांद ठीक घड़ी पर आया, और अंधेरे में बंद हैं मछलियां, उनको चांद का कोई पता नहीं, आकाश का कोई पता नहीं, जब चांद ठीक जगह पर आया, जब समुद्र की मछलियां जाकर तट पर अंडे देने लगीं, तब उन मछलियों ने पानी में ही अंडे दे दिए। उनका पानी में ही अंडे छोड़ देना--क्योंकि कोई तट नहीं, कोई किनारा नहीं, तब तो लहरों का कोई सवाल न रहा!

 

अगर कोई कहता हो कि दूसरी मछलियों को देख कर यह दौड़ पैदा हो जाती होगी। वह भी सवाल न रहा। अकेली मछलियों को रख कर भी देखा। ठीक जब करोड़ों मछलियां सागर के तट पर आएंगी...। इनके दिमाग को सब तरह से गड़बड़ करने की कोशिश की मछलियों के। चौबीस घंटे अंधेरे में रखा, ताकि उन्हें पता न चले कि कब सुबह होती है, कब रात होती है। चौबीस घंटे उजाले में भी रख कर देखा, ताकि उनको पता ही न चले कि कब रात होती है। झूठे चांद की रोशनी पैदा करके देखी कि रोज रोशनी को कम करते जाओ, बढ़ाते जाओ। लेकिन मछलियों को धोखा नहीं दिया जा सका। ठीक चांद जब अपनी जगह पर आया तब मछलियों ने अंडे दे दिए। जहां भी थीं, वहीं उन्होंने अंडे दे दिए।

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 12

कनपुरियोँ से अरोड़ा जी की भिड़न्त 

 

दो दिन बाद बैंक गया। सबेरे नौ बजे बैंक तो खुल गया था पर झाडू लग रही थी, सारे कर्मचारी नदारद। एक अदद चपरासी मौजूद था जिसने सलाह दी कि दस ग्यारह बजे आइए। यहां सब आराम से आते हैं। अब तक स्मृति के बंद किवाड़ खुलने लगे थे और जेटलैग तो क्या सांस्कृतिक लैग, व्यावहारिक लैग सब काफूर हो चले थे। दो घंटे के बाद वापस लौटा तो पूरे अस्सी आदमी लाइन में लगे थे। मैं भी लग गया।

थोड़ी देर में बैंक का चपरासी पहचान गया। दरअसल इसी शाखा में मेरे एक चाचाश्री मैनेजर रह चुके थे, अब उनका ट्रांसफर हो गया था। पर उनकी तैनाती के दिनों में यही चपरासी घर पर बैंक की चाभी लेने आता था। चपरासी का नाम भी याद आ गया शंभू। शंभू ज़ोर से चिल्लाया "अरे भईया आप यहां? कहां थे इतने दिन?" शंभू पंडित को यह तो पता था कि मैं कानपुर से बाहर काम करता हूं पर उसके "बाहर" की परिधि शायद हद से हद दिल्ली तक थी। मैंने भी अनावश्यक अमेरिका प्रवास का बखान उचित नहीं समझा और उसे टालने के लिए कह दिया कि बाहर काम कर रहा था, इसलिए अब कानपुर कम आता हूं। पर शंभू पंडित हत्थे से उखड़ गए। लगे नसीहत देने, "अरे भईया, कोई इतनी दूर भी नहीं गए हो कि दोस्तों के जनेऊ शादी में न आ सको। अरे, दिल्ली बंबई का किराया भी ज़्यादा नहीं है।" अब शंभू पंडित खांमखां फटे में टांग अड़ा रहे थे। उनको रंज था कि मैं अपने कुछ दोस्तों की शादी वगैरह में कानपुर नहीं पहुंचा था। शंभू पंडित के इस तरह से उलाहना से बड़ी विकट स्थिति हो रही थी।


भांडाफोड़ करना ही पड़ा, शंभू पंडित को जवाब उछाला, "अबे, अमेरिका में था, अब यहां हर महीने थोड़े ही आ सकता हूं?" इतना बोलना था कि आस–पास खड़े लोग मुड़कर देखने लगे और पहचानने की कोशिश करने लगे। यहां तक की बैंक मैनेजर के केबिन से आवाज़ आई, "अबे शंभू, कौन है? किससे बात कर रहे हो?" शंभू पंडित को यह ज़ोर का झटका धीरे से लगा था, सकपका कर बोले, "साहेब, अरोरा साहब के भतीजे हैं, अमेरिका में रहते हैं।" केबिन से फिर आवाज़ आई, "अबे तो उन्हें बाहर क्यों खड़ा कर रखा है।" एक मिनट के अंदर ही मैं मैनेजर साहब से मुखातिब था। मैनेजर साहब ने क्लर्क को केबिन में बुलाकर मेरे काम करवा दिया और अमेरिका के बारे में अपनी कुछ भांतियों का निराकरण करवाया। मेरा काम तो हो गया था पर मैं सोच रहा था वह अस्सी लोग जो लाइन में खड़े थे उन्हें क्या मैनेजर साहब बेवकूफ़ समझते थे जिनके ऊपर किसी भी नेता, अभिनेता, वीआईपी या एनआरआई को तवज्जो दी जा सकती है और वे उफ्फ तक नहीं करते।

एनआरआई तमगा

 

बार फिर फ़जीहत से बचने के लिए एनआरआई तमगा चमकाना पड़ा। हुआ कुछ यों कि लखनऊ फ़ोन करना था। वर्ष 2000 में मोबाईल डब्ल्यूएलएल, आरआईएल, और एसएमएस सरीखी तकनीकें ईजाद नही हुई थीं। पीसीओ सर्वसुलभ थे। मैं सीधे पीसीओ पहुंचा और लखनऊ का नंबर मिलाने लगा। दो–तीन बार प्रयास के बाद भी नंबर नहीं लग रहा था। संचालिका एक मध्यमवर्गीय घरेलू सी दिखने वाली नवयुवती थी। शायद संचालक कहीं तशरीफ़ ले गए थे और अपनी बहन को बैठाल गए थे। ख़ैर उस कन्या ने पूछा कि आपका नंबर तो सही है। मेरे हिसाब से तो सही होना चाहिए था, अभी पिछले ही महीने तो अमेरिका से मिलाया था। जब एक बार फिर मिलाने लगा तो कन्या ने टोका,
कन्या : 'आप क्या कर रहे हैं?'
मैं : लखनऊ का नंबर मिला रहा हूं।
कन्या : वह तो ठिक है पर एसटीडी कोड क्या मिला रहे हैं?
मैं :522, क्यों यह नही है क्या?
कन्या : 522 तो ठीक है पर ज़ीरो क्यों नहीं लगा रहे?
मैं : ज़ीरो दरअसल अमेरिका में आदत पड़ गई थी 011 91 522 नंबर मिलाने की, अब यहां 011 91 टपका कर शेष नंबर मिला रहा था।
कन्या : ज़ीरो मतलब शून्य!
 :मैं   अरे मुझे पता है ज़ीरो मतलब शून्य।
कन्या : लेकिन आप 522 के पहले शून्य क्यो नही लगा रहें? क्या पहली बार एसटीडी डायल किया है?


कन्या को अब कुछ शक हो चला था कि मैं शायद घाटमपुर सरीखे किसी देहात से उठकर सीधे शहर पहुंच गया हूं और शायद ज़िंदगी में पहली बार एसटीडी मिला रहा हूं। अब तक बाकी ग्राहकों की दिलचस्पी भी मुझमें बढ़ चली थी। सबकी तिर्यक दृष्टि से स्पष्ट था कि मैं वहां एक नमूना बनने जा रहा था, जो शक्लोसूरत और हावभाव से तो पढ़ा लिखा दिखता था पर उस नमूने को एसटीडी करने जैसे सामान्य काम की भी तमीज़ नही थी। मुझे याद आ गया कि करीब डेढ़ साल पहले एसटीडी मिलाने से पहले जीरो लगाने की आदत अमेरिका में आईएसडी मिलाते मिलाते छूट गई थी और यहां मैंने सिर्फ़ आईएसडी कोड हटाकर ज़ीरो न लगाने की नादानी कर डाली थी। खांमख़ा बताना पड़ा कि मैं ज़ीरो मतलब शून्य लगाना क्यों भूल रहा था।

अब उस षोडशी की दिलचस्पी यह जानने में पैदा हो गई थी कि मैनें कित्ते पैसे देकर अमेरिका में नौकरी हासिल की थी। निम्न मध्यवर्ग जिसे अमेरिका में स्किल्ड लेबर्स कहते हैं, अपने खेत खलिहान बेचकर भी खाड़ी या लंदन में काम पाने की फिराक में रहता है। यह चलन वैसे पंजाब में कुछ ज़्यादा है। डाटकाम के बुलबुले अभी दिल्ली, बंबई से कानपुर सरीखे शहरो तक नही पहुंचे थे इसलिए किसी भी कनपुरिए को किसी ऐसे एनआरआई कनपुरिया जो अभी भी कानपुर में एलएमएल वेस्पा पर घूम रहा हो देख कर ताज्जुब करना स्वाभाविक ही है।

Contd..

Go Back

Critical Assessment of Astrology -5

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश - 5 )

हम सबकी चमड़ियां अलग-अलग हैं, इंडिविजुअल हैं। अगर मेरा हाथ टूट जाए और मेरी चमड़ी बदलनी पड़े तो आपकी चमड़ी मेरे हाथ के काम नहीं आएगी। मेरे ही शरीर की चमड़ी उखाड़ कर लगानी पड़ेगी। इस पूरी जमीन पर कोई आदमी नहीं खोजा जा सकता जिसकी चमड़ी मेरे काम आ जाए।

क्या बात है? फिजियोलाजिस्ट से हम पूछें कि दोनों की चमड़ी की बनावट में कोई भेद है? चमड़ी के रसायन में कोई भेद है? चमड?ी में जो तत्व निर्मित करते हैं चमड़ी को, उसमें कोई भेद है?

तो कोई भेद नहीं है! मेरी चमड़ी और दूसरे आदमी की चमड़ी को अगर हम रख दें एक वैज्ञानिक को जांच करने के लिए तो वह यह न बता पाएगा कि ये दो आदमियों की चमड़ियां हैं। चमड़ियों में कोई भेद नहीं है, लेकिन फिर भी हैरानी की बात है कि मेरी चमड़ी पर दूसरे की चमड़ी नहीं बिठाई जा सकती। मेरा शरीर उसे इनकार कर देता है। वैज्ञानिक जिसे नहीं पहचान पाते कि कोई भेद है, लेकिन मेरा शरीर पहचानता है। मेरा शरीर इनकार कर देता है कि इसे स्वीकार नहीं करेंगे।

हां, एक ही अंडे से पैदा हुए दो बच्चों की चमड़ी ट्रांसप्लांट हो सकती है सिर्फ! एक-दूसरे की चमड़ी को एक-दूसरे पर बिठाया जा सकता है, शरीर इनकार नहीं करेगा। क्या कारण होगा? क्या वजह होगी? अगर हम कहें, एक ही मां-बाप के बेटे हैं। तो दो भाई भी एक ही मां-बाप के हैं, उनकी चमड़ी नहीं बदली जा सकती। सिवाय इसके कि ये दोनों बेटे एक क्षण में निर्मित हुए हैं और कोई इनमें समानता नहीं है। क्योंकि उसी बाप और उसी मां से पैदा हुए दूसरे भाई भी हैं, उन पर चमड़ी काम नहीं करती है। उनकी चमड़ी एक-दूसरे पर नहीं बदली जा सकती। सिर्फ इनका बर्थ मोमेंट--बाकी तो सब एक है, वही मां-बाप हैं--सिर्फ एक बात बड़ी भिन्न है और वह है इनके जन्म का क्षण!

क्या जन्म का क्षण इतने महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है कि उम्र भी दोनों की करीब-करीब, बुद्धि-माप करीब-करीब, दोनों की चमड़ियों का ढंग एक सा, दोनों के शरीर के व्यवहार करने की बात एक सी, दोनों बीमार पड़ते हैं तो एक सी बीमारियों से, दोनों स्वस्थ होते हैं तो एक सी दवाओं से--क्या जन्म का क्षण इतना प्रभावी हो सकता है?
ज्योतिष कहता रहा है, इससे भी ज्यादा प्रभावी है जन्म का क्षण।

लेकिन आज तक ज्योतिष के लिए वैज्ञानिक सहमति नहीं थी। पर अब सहमति बढ़ती जाती है। इस सहमति में कई नये प्रयोग सहयोगी बने हैं। एक तो, जैसे ही हमने आर्टीफीशियल सैटेलाइट्स, हमने कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़े वैसे ही हमें पता चला कि सारे जगत से, सारे ग्रह-नक्षत्रों से, सारे ताराओं से निरंतर अनंत प्रकार की किरणों का जाल प्रवाहित होता है जो पृथ्वी पर टकराता है। और पृथ्वी पर कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो उससे अप्रभावित छूट जाए।

हम जानते हैं कि चांद से समुद्र प्रभावित होता है। लेकिन हमें खयाल नहीं है कि समुद्र में पानी और नमक का जो अनुपात है वही आदमी के शरीर में पानी और नमक का अनुपात है--दि सेम प्रपोर्शन। और आदमी के शरीर में पैंसठ प्रतिशत पानी है; और नमक और पानी का वही अनुपात है जो अरब की खाड़ी में है। अगर समुद्र का पानी प्रभावित होता है चांद से तो आदमी के शरीर के भीतर का पानी क्यों प्रभावित नहीं होगा?

अभी इस संबंध में जो खोजबीन हुई उसमें दोत्तीन तथ्य खयाल में ले लेने जैसे हैं, वह यह कि पूर्णिमा के निकट आते-आते सारी दुनिया में पागलपन की संख्या बढ़ती है। अमावस के दिन दुनिया में सबसे कम लोग पागल होते हैं, पूर्णिमा के दिन सर्वाधिक। चांद के बढ़ने के साथ अनुपात पागलों का बढ़ना शुरू होता है। पूर्णिमा के दिन पागलखानों में सर्वाधिक लोग प्रवेश करते हैं और अमावस के दिन पागलखानों से सर्वाधिक लोग बाहर जाते हैं। अब तो इसके स्टेटिसटिक्स उपलब्ध हैं।
अंग्रेजी में शब्द है, लूनाटिक। लूनाटिक का मतलब होता है, चांदमारा। लूनार! हिंदी में भी पागल के लिए चांदमारा शब्द है। बहुत पुराना शब्द है। और लूनाटिक भी कोई तीन हजार साल पुराना शब्द है। कोई तीन हजार साल पहले भी आदमियों को खयाल था कि चांद पागल के साथ कुछ न कुछ करता है।

लेकिन अगर पागल के साथ करता है तो गैर-पागल के साथ नहीं करता होगा? आखिर मस्तिष्क की बनावट, आदमी के शरीर के भीतर की संरचना तो एक जैसी है। हां, यह हो सकता है कि पागल पर थोड़ा ज्यादा करता होगा, गैर-पागल पर थोड़ा कम कर सकता होगा। यह मात्रा का भेद होगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि गैर-पागल पर बिलकुल नहीं करता होगा। अगर ऐसा होगा तब तो कोई पागल कभी पागल न हो, क्योंकि सब गैर-पागल ही पागल होते हैं। पहले तो काम गैर-पागल पर ही करना पड़ता होगा चांद को।

 

 

 

 

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 11

अरोड़ा जी  NRI बनकर कानपुर छुट्टी पर लौटे..

 

 


 

डेढ़ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गईं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुंचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सवेरे के समय पहुंचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते–आते रात हो गई थी। पर इस्लामाबाद के ऊपर से उड़ते हुए पूरा समय आंखों में ही बीत गया, दिल्ली का आसमान ढूंढ़ते–ढूंढ़ते। रात एक बजे प्लेन ने दिल्ली की ज़मीन छुई तो प्लेन के अंदर सारे बच्चों ने करतल ध्वनि की। प्लेन में मौजूद विदेशी हमारा देशप्रेम देखकर अभिभूत थे, साथ ही यह देखकर भी कि किस तरह हम सब प्लेन से टर्मिनल पर आते ही अपनी भारत मां की धरती को मत्थे से लगाकर खुश हो रहे थे। कुछेक लोग जो वर्षों बाद लौटे थे, हर्षातिरेक में धरती पर दंडवत लोट गए।


हम नहीं सुधरेंगे


हालांकि थोड़ी ही देर में सारा हर्ष गर्म मक्खन की तरह पिघल कर उड़ गया जब कन्वेयर बेल्ट पर अपना सामान नदारद मिला। पता चला कि ब्रसेल्स और ज्युरिख के बीच एअरलाईन वाले सामान जल्दी में नहीं चढ़ा पाए अतः अगली उड़ान में भेजेंगे। उन लोगों ने मेरा सामान निकटतम एअरपोर्ट यानि कि लखनऊ भेजने का वायदा किया। अब मैं हाथ में इकलौता केबिन बैग लेकर ग्रीन चैनल की ओर बढ़ा जहां कस्टम आफ़िसर्स से पाला पड़ा। मेरे बैग में एक अदद सस्ता सा कॉर्डलेस और मेरे कपड़े थे। कस्टम आफ़िसर को वह दस डालर वाला फ़ोन कम से कम सौ डालर का मालूम हो रहा था। मुफ़्त में उसे 900 और 2•9 के फ़ोन का अंतर समझाना पड़ा। हालांकि आजकल कस्टम वाले ज़्यादा तंग नहीं करते, शायद उपर से सख्ती है या फिर अब विदेशी सामान का ज़्यादा क्रेज़ नहीं रहा। पर वर्ष 2000 में स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।

मेरे एक मित्र श्रीमान वेदमूर्ति जिन्हें अक्सर काम के सिलसिले में भारत जाना पड़ता था, इन कस्टम वालों की चेकिंग से अज़िज़ आकर किसी खडूस कस्टम क्लर्क को अच्छा सबक सिखा आए थे। जनाब ने किसी चाईनाटाउन से ऐसा सरदर्द वाले बाम की डिब्बियां ख़रीदी थी जिनपर अंग्रेज़ी में कुछ न लिखा था, इन डिब्बियों को जनाब वेदमूर्ती ने वियाग्रा जेली बताकर इंदिरा गांधी हवाईअड्डे पर कस्टम क्लर्क को टिका दिया था। अब आगे क्या हुआ, यह जानने से बचने के लिए जनाब वेदमूर्ति यथासंभव इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर जाने से कतराते हैं।


इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?


दिल्ली से कानपुर का सफ़र शताब्दी पर कट गया। सुना है कि दूसरे की दाल में घी हमेशा ज़्यादा दिखता है। यही कहावत आज खुद पर चरितार्थ हो रही थी। पहले रास्ते में पड़े गांव कस्बे जिनको महज़ डेढ़ साल पहले ट्रेन से देखने लायक नहीं समझता था और सिर्फ़ सफ़र का अनचाहा हिस्सा लगते थे, आज बेहतरीन लैंडस्केप का नमूना लग रहे थे। रास्ते में पड़ने वाली रेल क्रासिंग पर ट्रैक्टर, मोटरसाईकिल और साईकिल पर सवार लोग, लगता था कि बिल्कुल बेतक़ल्लुफ़ और हमारी तेज़रफ़्ता ज़िंदगी के मुकाबले कितने बेफिक्र हैं। मेरी इस राय से मेरे साथ चल रहे मेरे साले साहब यानि कि राजू भाई भी इत्तफ़ाक़ रखते हैं। मज़े की बात है कि राजू भाई को कानपुर की ज़िंदगी तेज़रफ़्ता लग रही है। अपने–अपने पैमाने हैं, पर साफ़ दिख रहा है कि सारे भौतिक सुख बटोर लेने की चाहत ने हमारे कानपुर, लखनऊ सरीखे शहरों में भी अदृश्य एचओवीलेन पैदा कर दी हैं। शेरो–शायरी का कोई ख़ास शौक तो नहीं मुझे पर एक ग़ज़ल का टुकड़ा याद आता है, "इस शहर में हर शख्स परेशान क्यों है?"


ओमनी वैन


कानपुर सेंट्रल पर पूरा परिवार अगवानी करने आ गया था। हमारे चाचाश्री किसी मित्र की मारूति ओमनी वैन मय ड्राइवर के ले आए थे। आख़िर भतीजा अमेरिका से आ रहा है, मजाल है कि आटो या रिक्शे पर चला जाए। पिछली दो सीटों पर जहां अमेरिका में महज़ पांच लोग बैठते हैं, यहां आठ दस लोग बैठ गए थे। मैं ड्राइवर के बगल में बैठा तो बगल के दरवाज़े से चाचाश्री प्रविष्ट हुए यह कहते हुए कि 'ज़रा खिसको गुरु।' खिसकने के लिए गियर के दोनों तरफ़ पैर डालने पड़े। अब दायीं तरफ़ से ड्राइवर साहब गुज़ारिश कर रहे थे कि भाईजान ज़रा गियर लगाना है, पैर खिसका लीजिए। उधर सामने सड़क पर गाय, भैंसे और साइकिलें, मालुम पड़ रहा था कि विंडस्क्रीन से चिपके हुए चल रहे हैं और कहीं गाड़ी से लड़ न जाए। ऐसा नहीं था कि मैं इन चीज़ों का आदी नहीं हूं, अरे भाई पूरे दस साल मैंने भी साइकिल, टीवीएस चैंप और एलएमएल वेस्पा इन्हीं सड़कों पर चलाई है और ऐसी चलाई है कि जान अब्राहम भी नहीं चला सकता। पर महज़ एक साल के अमेरिका प्रवास ने आदत बिगाड़ दी है। अपनी ही सड़क पर हल्की सी दहशत मालूम हो रही है। सिर्फ़ एक समझदारी की मैंने, कि वैन में यातायात पर कुछ नहीं बोला, नहीं तो पिछली सीट पर बैठे भाई–बहनों की टीकाटिप्पणियों की बौछार कुछ यों आती।


'एक ही साल में रंग बदल गया।'
'रंगबाजी न झाड़ो।'
'जनाब एनआरआई हो गए हैं।'
'यह अटलांटा नहीं कानपुर है प्यारे।'
कनपुरिये तो अटलांटा में कार दौड़ा सकते हैं लेकिन किसी अमेरिकी की हिम्मत है जो कनपुरिया ट्रैफिक के आगे टिक सके?
सुना है तेरी महफ़िल में
एक पुराना गाना याद आता है जो कुछ यों है–
साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी
सुना है तेरी महफ़िल में रतजगा है।


पूरे 36 घंटों का सफ़र कट गया पर रात में जेटलैग शुरू हो गया। इस बला से लंबी हवाई यात्रा कर चुके लोग वाकिफ़ हैं। दरअसल अमेरिका से भारत आते हुए आप समय की कई स्थानीय सीमाएं लांघ कर आते हैं। अमूमन अगर आप अमेरिका से शाम को चलते हैं जब भारत में स्थानीय समय के हिसाब से सुबह होती है। भारत का समय आम तौर पर अमेरिका से 11 घंटे आगे चलता है। इसीलिए शुरू में कई रिश्तेदार जो इस अलबेले समय के झमेले से नावाकिफ़ थे, फ़ोन करने पर हैरान होते थे कि उनके सोने जाने के समय मैं सवेरे की चाय कैसे पी रहा हूं? जब आप दिल्ली पहुंचते हैं तो आपका शरीर उस 11 घंटे की समय सीमा को तुरंत नहीं लांघ पाता। उसे भारत के दिन में रात महसूस होती है। इसीलिए रात के दो तीन बजे नींद खुल जाती है और दोपहर में आदमी सुस्ती महसूस करता है। हालांकि कुछ लोग इसे एनआरआई लटके झटके समझ लेते हैं।

 

Go Back

Critical Assessment of Astrology -4

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश -4)

 ब्राउन एक दूसरे शास्त्र का अन्वेषक है। और उस शास्त्र को अभी ठीक-ठीक नाम मिलना शुरू हो रहा है। लेकिन अभी उसे कहते हैं प्लेनेटरी हेरिडिटी, उपग्रही वंशानुक्रम। अंग्रेजी में शब्द है, होरोस्कोप। वह यूनानी होरोस्कोपस का रूप है। होरोस्कोपस, यूनानी शब्द का अर्थ होता है: मैं देखता हूं जन्मते हुए ग्रह को। शब्द का अर्थ होता है।

असल में जब एक बच्चा पैदा होता है तब उसी समय पृथ्वी के चारों ओर क्षितिज पर अनेक नक्षत्र जन्म लेते हैं, उठते हैं। जैसे सूरज उठता है सुबह। जैसे सुबह सूरज उगता है, सांझ डूबता है, ऐसे ही चौबीस घंटे अंतरिक्ष में नक्षत्र उगते हैं और डूबते हैं। जब एक बच्चा पैदा हो रहा है--समझें सुबह छह बजे बच्चा पैदा हो रहा है--वही वक्त सूरज भी पैदा हो रहा है। उसी वक्त और कुछ नक्षत्र पैदा हो रहे हैं, कुछ नक्षत्र डूब रहे हैं। कुछ नक्षत्र ऊपर हैं, कुछ नक्षत्र उतार पर चले गए, कुछ नक्षत्र चढ़ाव पर हैं। यह बच्चा जब पैदा हो रहा है तब अंतरिक्ष की, अंतरिक्ष में नक्षत्रों की एक स्थिति है।

अब तक ऐसा समझा जाता था, और अभी भी अधिक लोग जो बहुत गहराई से परिचित नहीं हैं वे ऐसा ही सोचते हैं, कि चांदत्तारों से आदमी के जन्म का क्या लेना-देना! चांदत्तारे कहीं भी हों, इससे एक गांव में बच्चा पैदा हो रहा है, इससे क्या फर्क पड़ेगा!

फिर वे यह भी कहते हैं कि एक ही बच्चा पैदा नहीं होता, एक तिथि में, एक नक्षत्र की स्थिति में लाखों बच्चे पैदा होते हैं। उनमें से एक प्रेसिडेंट बन जाता है किसी मुल्क का, बाकी तो नहीं बन पाते। एक उनमें से सौ वर्ष का होकर मरता है, दूसरा दो दिन का ही मर जाता है। एक उनमें से बहुत बुद्धिमान होता है और एक निर्बुद्धि रह जाता है।

तो साधारण देखने पर पता चलता है कि इन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का किसी के बच्चे के पैदा होने से, होरोस्कोप से क्या संबंध हो सकता है? यह तर्क इतना सीधा और साफ मालूम होता है कि ये चांदत्तारे एक बच्चे के जन्म की चिंता भी नहीं करते हैं। और फिर एक बच्चा ही पैदा नहीं होता, एक स्थिति में लाखों बच्चे पैदा होते हैं, पर लाखों बच्चे एक से नहीं होते। इन तर्कों से ऐसा लगने लगा था--तीन सौ वर्षों से ये तर्क दिए जा रहे हैं--कि कोई संबंध नक्षत्रों से व्यक्ति के जन्म का नहीं है।

लेकिन ब्राउन, पिकॉडी, और इन सारे लोगों की, तोमातो, इन सबकी खोज का एक अदभुत परिणाम हुआ है। और वह यह कि ये वैज्ञानिक कहते हैं, अभी हम यह तो नहीं कह सकते कि व्यक्तिगत रूप से कोई बच्चा प्रभावित होता होगा, लेकिन अब हम यह पक्के रूप से कह सकते हैं कि जीवन प्रभावित होता है। एक बात, व्यक्तिगत रूप से बच्चा प्रभावित होता होगा, हम अभी नहीं कह सकते हैं, लेकिन जीवन निश्चित रूप से प्रभावित होता है। और अगर जीवन प्रभावित होता है तो हमारी खोज जैसे-जैसे सूक्ष्म होगी वैसे-वैसे हम पाएंगे कि व्यक्ति भी प्रभावित होता है।

इसमें एक बात और खयाल में ले लेनी जरूरी है। जैसा सोचा जाता रहा है--वह तथ्य नहीं है--ऐसा सोचा जाता रहा है कि ज्योतिष विकसित विज्ञान नहीं है। प्रारंभ उसका हुआ और फिर वह विकसित नहीं हो सका। लेकिन मेरे देखे स्थिति उलटी है। ज्योतिष किसी सभ्यता के द्वारा बहुत बड़ा विकसित विज्ञान है, फिर वह सभ्यता खो गई और हमारे हाथ में ज्योतिष के अधूरे सूत्र रह गए। ज्योतिष कोई नया विज्ञान नहीं है जिसे विकसित होना है, बल्कि कोई विज्ञान है जो पूरी तरह विकसित हुआ था और फिर जिस सभ्यता ने उसे विकसित किया वह खो गई। और सभ्यताएं रोज आती हैं और खो जाती हैं। फिर उनके द्वारा विकसित चीजें भी अपने मौलिक आधार खो देती हैं, सूत्र भूल जाते हैं, उनकी आधारशिलाएं खो जाती हैं।

विज्ञान आज इसे स्वीकार करने के निकट पहुंच रहा है कि जीवन प्रभावित होता है। और एक छोटे बच्चे के जन्म के समय उसके चित्त की स्थिति ठीक वैसी होती है जैसे बहुत सेंसिटिव फोटो प्लेट की। इस पर दोत्तीन बातें और खयाल में ले लें, ताकि समझ में आ सके कि जीवन प्रभावित होता है। और अगर जीवन प्रभावित होता है तो ही ज्योतिष की कोई संभावना निर्मित होती है, अन्यथा निर्मित नहीं होती। जुड़वां बच्चों को समझने की थोड़ी कोशिश करें।

दो तरह के जुड़वां बच्चे होते हैं। एक तो जुड़वां बच्चे होते हैं जो एक ही अंडे से पैदा होते हैं। और दूसरे जुड़वां बच्चे होते हैं जो होते तो जुड़वां हैं लेकिन दो अंडों से पैदा होते हैं। मां के पेट में दो अंडे होते हैं, दो बच्चे पैदा होते हैं। कभी-कभी एक ही अंडा होता है और एक अंडे के भीतर दो बच्चे होते हैं। एक अंडे से जो दो बच्चे पैदा होते हैं वे बड़े महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि उनके जन्म का क्षण बिलकुल एक होता है। दो अंडों से जो बच्चे पैदा होते हैं उन्हें जुड़वां हम कहते जरूर हैं, लेकिन उनके जन्म का क्षण एक नहीं होता।

और एक बात समझ लें कि जन्म दोहरी बात है। जन्म का पहला अर्थ तो है गर्भाधारण। ठीक जन्म तो उस दिन होता है जिस दिन मां के पेट में गर्भ आरोपित होता है--ठीक जन्म! जिसको आप जन्म कहते हैं वह नंबर दो का जन्म है जब बच्चा मां के पेट से बाहर आता है। अगर हमें ज्योतिष की पूरी खोजबीन करनी हो--जैसे कि हिंदुओं ने की थी, अकेले हिंदुओं ने की थी और उसके बड़े उपयोग किए थे--तो असली सवाल यह नहीं है कि बच्चा कब पैदा होता है, असली सवाल यह है कि बच्चा कब गर्भ में प्रारंभ करता है अपनी यात्रा, गर्भ कब निर्मित होता है! क्योंकि ठीक जन्म वही है। इसलिए हिंदुओं ने तो यह भी तय किया था कि ठीक जिस भांति के बच्चे को जन्म देना हो उस भांति के ग्रह-नक्षत्र में यदि संभोग किया जाए और गर्भाधारण हो जाए तो उस तरह का बच्चा पैदा होगा।

अब इसमें मैं थोड़ा पीछे आपको कुछ कहूंगा, क्योंकि इस संबंध में भी काफी काम इधर हुआ है और बहुत सी बातें साफ हुई हैं। साधारणतः हम सोचते हैं कि एक बच्चा सुबह छह बजे पैदा होता है, तो छह बजे पैदा होता है इसलिए छह बजे प्रभात में जो नक्षत्रों की स्थिति होती है उससे प्रभावित होता है। लेकिन ज्योतिष को जो गहरा जानते हैं वे कहते हैं कि वह छह बजे पैदा होने की वजह से ग्रह-नक्षत्र उस पर प्रभाव डालते हैं, ऐसा नहीं! वह जिस तरह के प्रभावों के बीच पैदा होना चाहता है उस घड़ी और नक्षत्र को जन्म के लिए चुनता है। यह बिलकुल भिन्न बात है। बच्चा जब पैदा हो रहा है, ज्योतिष की गहन खोज करने वाले लोग कहेंगे कि वह अपने ग्रह-नक्षत्र चुनता है कि कब उसे पैदा होना है।

और गहरे जाएंगे तो वह अपना गर्भाधारण भी चुनता है। प्रत्येक आत्मा अपना गर्भाधारण चुनती है कि कब उसे गर्भ स्वीकार करना है, किस क्षण में। क्षण छोटी घटना नहीं है। क्षण का अर्थ है कि पूरा विश्व उस क्षण में कैसा है! और उस क्षण में पूरा विश्व किस तरह की संभावनाओं के द्वार खोलता है!

जब एक अंडे में दो बच्चे एक साथ गर्भाधारण लेते हैं तो उनके गर्भाधारण का क्षण एक ही होता है और उनके जन्म का क्षण भी एक होता है। अब यह बहुत मजे की बात है कि एक ही अंडे से पैदा हुए दो बच्चों का जीवन इतना एक जैसा होता है, इतना एक जैसा होता है कि यह कहना मुश्किल है कि जन्म का क्षण प्रभाव नहीं डालता। एक अंडे से पैदा हुए दो बच्चे, उनका आई.क्यू., उनका बुद्धि-माप करीब-करीब बराबर होता है। और जो थोड़ा सा भेद दिखता है, वे जो जानते हैं वे कहते हैं कि वह हमारी मेजरमेंट की गलती के कारण है। अभी तक हम ठीक मापदंड विकसित नहीं कर पाए हैं जिनसे हम बुद्धि का अंक नाप सकें। थोड़ा सा जो भेद कभी पड़ता है वह हमारे तराजू की भूल-चूक है। अगर एक अंडे से पैदा हुए दो बच्चों को बिलकुल अलग-अलग पाला जाए तो भी उनके बुद्धि-अंक में कोई फर्क नहीं पड़ता। एक को हिंदुस्तान में पाला जाए और एक को चीन में पाला जाए और कभी एक-दूसरे को पता भी न चलने दिया जाए! ऐसी कुछ घटनाएं घटी हैं जब दोनों बच्चे अलग-अलग पले, बड़े हुए। लेकिन उनके बुद्धि-अंक में कोई फर्क नहीं पड़ता।


बड़ी हैरानी की बात है, बुद्धि-अंक तो ऐसी चीज है कि जन्म की पोटेंशियलिटी से जुड़ी है। लेकिन वह जो चीन में जुड़वां बच्चा है एक ही अंडे का, जब उसको जुकाम होगा, तब जो भारत में बच्चा है उसको भी जुकाम हो जाएगा। आमतौर से एक अंडे से पैदा हुए बच्चे एक ही साल में मरते हैं। ज्यादा से ज्यादा उनकी मृत्यु में फर्क तीन महीने का होता है और कम से कम तीन दिन का, पर वर्ष वही होता है। अब तक ऐसा नहीं हो सका कि एक ही अंडे से पैदा हुए दो बच्चों की मृत्यु के बीच वर्ष का फर्क पड़ा हो। तीन महीने से ज्यादा का फर्क नहीं पड़ता है। अगर एक बच्चा मर गया है तो हम मान सकते हैं कि तीन दिन के बाद और तीन महीने के बीच दूसरा बच्चा मर जाएगा। इनके रुझान, इनके ढंग, इनके भाव समानांतर होते हैं। और करीब-करीब ऐसा मालूम पड़ता है कि ये दोनों एक ही ढंग से जीते हैं। एक-दूसरे की कापी की भांति होते हैं। इनका इतना एक जैसा होना और बहुत सी बातों से सिद्ध होता है।



 

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 10

 अमेरिकन स्वतंत्रता दिवस की मस्ती

 

 

अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस 4 जुलाई को मनाया जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर याद आती हैं 'सारे जहां से अच्छा' की स्वर लहरियां, रंग बिरंगी झंडियां, स्कूल में बंटने वाले बूंदी के लड्डू, टीवी पर यह गिनना कि राजीव गांधी ने कितनी बार 'हम देख रहे हैं' या 'हम देखेंगे' कहा। यहां माजरा कुछ दूसरा दिखता है। जगह–जगह स्टार और स्ट्राइप्स यानि अमेरिकी झंडा तो दिखता है, पर वह तो वैसे भी साल भर हर कहीं दिख सकता है। पूरी आज़ादी है आपको अमेरिकी झंडा लगाने की और तो और लोग स्टार और स्ट्राइप्स वाली टी शर्ट और बनियान तक पहन डालते हैं। चारों ओर सेल के नज़ारे। हां, शाम को तकरीबन हर शहर में संगीत समारोह, खाना–पीना और धुआंधार आतिशबाज़ी ज़रूर होती है।


इस अवसर पर होने वाली तीन दिन की छुट्टी का देशी बिरादरी जम कर सदुपयोग करती है। यह निर्भर करता है आपके प्रवास के अनुभव पर। हमारे सरीखे नए नवेले अप्रवासी पूरे दिन पर्यटन पर खर्च कर डालते हैं। अक्सर मित्रों के साथ भ्रमण रोमांच को दुगना कर देता है। डलास में चार जुलाई को रूबी फॉल यानि जलप्रपात देखने का कार्यक्रम निर्धारित हुआ। केडीगुरू साथ चल रहे थे। केडीगुरू हमारे कालेज के ज़माने के कनपुरिया मित्र हैं। ख़ासे ज़िन्दादिल और शौकीन तबियत के इंसान। हांलांकि स्वभाव के मामले में थोड़े प्रेशर कुकर हैं यानि कि संयम बहुत जल्दी खो देते हैं पर जल्द ठंडे हो जाते हैं।

तो जनाब डलास से हम और केडीगुरू एक साथ चले टेनेसी चैटेनोगा की ओर। रास्ते में मैने ध्यान दिया कि केडीगुरू ड्राइव करते हुए कुछ–कुछ कनपुरिया टेंपो वाले की भांति खुली हथेली स्टेयरिंग पर चिपका कर गाड़ी मोड़ रहे थे और लेन चेंज करते समय कंधे को मिथुन चक्रवर्ती की तरह झटका देते थे। यह प्रक्रिया अनवरत चलने पर मैने अपने कौतूहल को रोकना उचित नहीं समझा। पता चला कि केडीगुरू ने भारत में अपने ड्राइवर से कार चलाना सीखा था और यह दो गुर बोनस में सीख लिए थे। मुझे मक्षिका स्थाने मक्षिका वाल किस्सा याद आ रहा था जिसमें एक नकलची अपने से आगे वाले परीक्षार्थी की कॉपी लाइन दर लाइन टीपते समय एक जगह आगे वाले की कॉपी में मरी मक्खी चिपकी देखने पर एक मक्खी मार कर ठीक उसी जगह चिपका देता है।


पढ़े लिखे भी झाड़ू लगाते हैं


केडीगुरू ने मज़ेदार आपबीती सुनाई। वे ऑफिस से घर का रास्ता लोकल टे्रन से तय करते हैं। एक दिन स्टेशन जाते समय वे फुटपाथ पर चल रहे थे। कुछ सोचते–सोचते केडीगुरू का सूक्ष्म शरीर चांदनी चौक पहुंच गया और स्थूल शरीर टेनिसी के फुटपाथ पर चलता रहा। रास्ते में एक भीमकाय अश्वेत झाड़ू लगा रहा था। और अमेरिकन सभ्यतानुसार केडी गुुरू से, "हाई मैन, हाउ यू डूइंग" बोला। केडीगुरू बेखुदी में सोचने लगे कि क्या ज़माना आगया है जो पढ़े लिखे अंग्रेज़ीदां लोगों को भी झाड़ू लगानी पड़ रही है। केडीगुरू उसकी हालत पर अफसोस प्रकट कर सरकार को कोसने जा ही रहे थे कि उन्हें ख्याल आया कि वे चांदनी चौक में नहीं अमेरिका में हैं जहां अनपढ़ भी अंग्रेजी ही बोलते हैं।


रूबी फ़ॉल


एक प्रकृतिक करिश्मा है यह मनोरम स्थल। पहले आपको एक पाहाड़ी पर स्थित लिफ्ट से 260 फुट नीचे गुफ़ा में जाना होता है फिर करीब एक मील इस गुफ़ा में चलना होता है। हज़ारों सालों में पानी के कटाव ने चूने के पत्थरों में कटाव से नयनाभिराम आकृतियां उकेर दी हैं। केडीगुरू और मेरा मानना था कि अगर यह स्थल भारत में होता तो शर्तिया हर कदम पर एक चट्टान के पास एक पंडा दक्षिणा वसूल रहा होता उनको शिवलिंग या संतोषी माता का स्वरूप बताते हुए। गुफ़ा के अंत में घुप अंधेरा था। नेपथ्य में मधुर संगीत के साथ पानी की आवाज़ विस्मय पैदा कर रही थी। गाइड ने जब बत्तियां जलाईं तो सामने से 145 फुट की ऊंचाई से गिरता रूबी जलप्रपात दिखाई दिया।

 

भइये एंकर तो पानी में फेंक दो


चैटनोगा में एक झील में हम लोगों को चप्पू वाली नौका चलाने की सूझी। अमेरिकियों ने व्यवसायिकता की हद कर रखी है। टिकट के साथ इंश्योरेंस भी बेच रहे थे। खै.र एक नौका पर केडीगुरू सपत्नीक लपक लिए। मैं किनारे पर दूसरी नाव की बाट जोह रहा था कि देखा केडीगुरू की नाव चकरघिन्नी की तरह सिर्फ गोल ही घूम रही है और केडीगुरू नाव की इस बेजा हरकत पर लाल पीले हो रहे हैं। उनकी पत्नी उन्हें समझाने का प्रयत्न कर रहीं थीं कि शायद नाव चलाने में कोई बेसिक गलती हो रही है पर केडीगुरू को नाव में कोई निर्माणगत ख़ामी नज़र आ रही थी। पंद्रह मिनट बीत जाने पर केडीगुरू ने झल्लाकर अपने हाथ वाला चप्पू ही पानी में फेंक दिया। यह देख कर उनकी पत्नी सन्न रह गयीं। तभी मेरे बगल में खड़े एक भारतीय सज्जन ने कहा, "अपने दोस्त को बोलो, वह नाव का एंकर पानी में क्यों नहीं फेंकता?" इसके बाद केडीगुरू की खिसियानी हंसी, उनकी पत्नी के सैंडिल का चप्पू के स्थान पर प्रयोग कर के नाव को किनारे लाना, दूसरा चप्पू लेना और फिर रास्ते भर उनकी प्रताड़ना — यह सब अब इतिहास बन चुका है।

कैपेचिनो या एस्प्रेसो


वापस आते वक्त चाय की तलब लगी थी पर यहां अगर हर एक्ज़िट रैंप पर चाय का ढाबा और पान की दूकान होती तो क्या बात होती। कुछ ऐसा नज़ारा होता कि एक्ज़िट रैंप पर कारों की कतारें होतीं और पप्पू गप्पू कुल्हड़ में चाय परोस कर कारवालों की खिड़कियों तक पहुंचा रहे होते। लगता है यह सब होते होते पचास एक साल लग जाएंगे। खैर स्टारबक्स से काम चलाने की मजबूरी थी। यह शायद हमारा पहला तजुर्बा था। स्टारबक्स में कॉफी पीने के लिए कम से कम पचास तरह की कॉफी के प्रकार उपलब्ध थे। कैपेचीनो, एक्सप्रेसो, मोचा, लैटे आदि आदि की भूल भुलैया में हमें झाग वाली दूधिया कॉफी याद आ रही थी। केडीगुरू ने कुछ नया ट्राइ करने के चक्कर में कैपेचीनो आर्डर कर दी। काउंटर से सवाल दागा गया— वन शॉट या टूशॉट अब यह जुमला तो मयखाने में ज्यादा चलता है। केडीगुरू गच्चा खा गए और बोले— टूशॉट। हाथ में लगा एक बित्ते भर का गिलास जिसमें दो छंटाक कॉफी सरीखा काढ़ा परोसा गया था। बहुत देर मगजमारी के बाद समझ आया कि उसमें दूध इत्यादि खुद ही दूसरे काउंटर पर मिलाना था। बहरहाल काफी का आनंद लेने के बाद हम वापस घर को चल दिये। हांलांकि केडीगुरू के टू शॉट ने दो घंटे बाद असर दिखाया और उन्हें पेचिश लग गई।

अति व्यवस्था के झटके


रात में हम होटल आकर रूके और दो कमरों में ठहर गए। खाने के लिए मैं और केडीगुरू सामने के पीज़ा रेस्टोरेंट पर आर्डर करने गए। रेस्टोरेंट का दरवाज़ा बंद था और बाहर खड़े दो कर्मचारी धूम्रपान में मशगूल थे। उन्होंने पीज़ा का आर्डर लेने से इनकार कर दिया। उनका दिया तर्क अतिव्यवस्था के दुष्परिणाम दिखा रहा था। रेस्टोरेंट की व्यवस्था के अनुसार एक बार काउंटर बंद हो जाने के बाद वो सिर्फ फोन पर ही आर्डर ले सकते थे। यानि कोई जुगाड़ वाली व्यवस्था नहीं। केडीगुरू दांत पीसते हुए वापस आए और अपने कमरे से दो पीज़ा का आर्डर देकर पेचिश निवारण हेतु बाथरूम में घुस गए। उनकी पत्नी हमारे कमरे में आकर मेरी पत्नी से बात करने लगी। दो मिनट बाद देखा कि एक पीज़ा डिलवरी वाल केडीगुरू के कमरे का दरवाज़ा पीट रहा है। बाहर आकर उससे पीज़ा मांगा तो अगला शगूफा हाज़िर था। पीज़ा हमारे पैसे देने पर और केडीगुरू की पत्नी के यह दिलासा देने पर भी कि आर्डर देने वाला उनका पति है, उन्हें पीज़ा देने को तैयार नहीं था। उनकी पॉलिसी थी कि आर्डर उसी कमरे में सप्लाई होगा जहां के कमरे से आर्डर बुक किया गया था। हमारे सामने पीज़ा वाले को दरवाज़ा पीटते हुए टापते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। दो मिनट बाद केडीगुरू तौलिया लपेटे आग्नेय नेत्रों से हमें घूरते प्रकट हुए। पीज़ा वाले की व्यवसायिक मजबूरी जानने के बाद उनके पास मस्तक ठोंकने के सिवा कोई चारा नहीं था।

वह खिड़की बंद रहती है


नैशविले से वापस आते हुए बड़ा संगीन कांड हो गया। अंधेरा छा गया था और डलास आने में करीब दो घंटे बाकी थे। रास्ते में हमने रात्रिभोज करने के लिए एक कस्बे में कर रोकी। एक चाइनीज़ रेस्टोरेंट में खाने का आर्डर दिया कि तभी मेरी चारुचंद्र को फ्रेंच फ्राई खाने की हठ सवार हो गई। केडीगुरू स्नेहवश खुद ही सड़क के दूसरी तरफ बने मैक्डॉनल्ड में पैदल ही फ्रेंच फ्राई लेने चल दिए। करीब 15 मिनट बाद केडीगुरू एक पुलिस आफिसर के साथ नमूदार हुए जो यह तसल्ली करना चाहता था कि उनके साथ और कौन है। हमें देखने के बाद पुलिस वाला खिसियानी हंसी हंसने लगा और केडीगुरू भुनभुनाने लगे। दर असल बदकिस्मती से मैक्डानल्ड का रेस्टोरेंट बंद हो गया था। सिर्फ ड्राइवइन खुला था। ड्राइव इन वह खिड़की है जो रेस्टोरेंट के अंदर जाए बिना आप कार में बैठे बैठे खाने के सामान का आर्डर दे सकते हैं और भुगतान कर के अपना सामान ले सकते हैं। केडीगुरू उस खिड़की पर पैदल पहुंच गए और उनकी खिड़की के कांच पर उंगली से ठक ठक कर के खिड़की खुलवाने का आग्रह करने लगे। कमअक्ल रेस्टोरेंट वालों ने शायद पहली बार ड्राइव इन खिड़की पर वॉक इन ग्राहक देख कर उन्हें कोई चोर उचक्का समझ लिया और पुलिस बुला ली थी।

Go Back

Critical Assessment of Astrology -3

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश -3)

   

इस संबंध में--पैरासेलीसस को हुए तो कोई पांच सौ वर्ष होते हैं, उसकी बात भी खो गई थी--लेकिन अब पिछले बीस वर्षों में, उन्नीस सौ पचास के बाद दुनिया में ज्योतिष का पुनर्आविर्भाव हुआ है। और आपको जान कर हैरानी होगी कि कुछ नये विज्ञान पैदा हुए हैं जिनके संबंध में कुछ आपसे कह दूं तो फिर पुराने विज्ञान को समझना आसान हो जाएगा। उन्नीस सौ पचास में एक नयी साइंस का जन्म हुआ। उस साइंस का नाम है कास्मिक केमिस्ट्री, ब्रह्म-रसायन। उसको जन्म देने वाला आदमी है, जियॉजारजी जिऑरडी। यह आदमी इस सदी के कीमती से कीमती थोड़े से आदमियों में एक है। इस आदमी ने वैज्ञानिक आधारों पर प्रयोगशालाओं में अनंत प्रयोगों को करके यह सिद्ध किया है कि जगत, पूरा जगत, एक आर्गेनिक यूनिटी है। पूरा जगत एक शरीर है।

और अगर मेरी अंगुली बीमार पड़ जाती है तो मेरा पूरा शरीर प्रभावित होता है। शरीर का अर्थ होता है कि टुकड़े अलग-अलग नहीं हैं, संयुक्त हैं, जीवंत रूप से इकट्ठे हैं। अगर मेरी आंख में तकलीफ होती है तो मेरे पैर का अंगूठा भी अनुभव करता है। और अगर मेरे पैर को चोट लगती है तो मेरे हृदय को भी खबर मिलती है। और अगर मेरा मस्तिष्क रुग्ण हो जाता है तो मेरा शरीर पूरा का पूरा बेचैन हो जाएगा। और अगर मेरा पूरा शरीर नष्ट कर दिया जाए तो मेरे मस्तिष्क को खड़े होने के लिए जगह मिलनी मुश्किल हो जाएगी। मेरा शरीर एक आर्गेनिक यूनिटी है--एक एकता है जीवंत। उसमें कोई भी एक चीज को छुओ तो सब प्रवाहित होता है, सब प्रभावित हो जाता है।

कास्मिक केमिस्ट्री कहती है कि पूरा ब्रह्मांड एक शरीर है। उसमें कोई भी चीज अलग-अलग नहीं है, सब संयुक्त है। इसलिए कोई तारा कितनी ही दूर क्यों न हो, वह भी जब बदलता है तो हमारे हृदय की गति को बदल जाता है। और सूरज चाहे कितने ही फासले पर क्यों न हो, जब वह ज्यादा उत्तप्त होता है तो हमारे खून की धाराएं बदल जाती हैं। हर ग्यारह वर्षों में...।

पिछली बार जब सूरज पर बहुत ज्यादा गतिविधि चल रही थी और अग्नि के विस्फोट चल रहे थे, तो एक जापानी चिकित्सक तोमातो बहुत हैरान हुआ। वह चिकित्सक स्त्रियों के खून पर निरंतर काम कर रहा था बीस वर्षों से। स्त्रियों के खून की एक विशेषता है जो पुरुषों के खून की नहीं है। उनके मासिक धर्म के समय उनका खून पतला हो जाता है। और पुरुष का खून पूरे समय एक सा रहता है। स्त्रियों का खून मासिक धर्म के समय पतला हो जाता है, या गर्भ जब उनके पेट में होता है तब उनका खून पतला हो जाता है। पुरुष और स्त्री के खून में एक बुनियादी फर्क तोमातो अनुभव कर रहा था।

लेकिन जब सूरज पर बहुत जोर से तूफान चल रहे थे आणविक शक्तियों के--हर ग्यारह वर्ष में चलते हैं--तो वह चकित हुआ कि पुरुषों का खून भी पतला हो जाता है। जब सूरज पर आणविक तूफान चलता है तब पुरुष का खून भी पतला हो जाता है। यह बड़ी नयी घटना थी, यह इसके पहले कभी रिकार्ड नहीं की गई थी कि पुरुष के खून पर सूरज पर चलने वाले तूफान का कोई प्रभाव पड़ेगा। और अगर खून पर प्रभाव पड़ सकता है तो फिर किसी भी चीज पर प्रभाव पड़ सकता है।
एक दूसरा अमरीकन विचारक है फ्रेंक ब्राउन। वह अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाने का काम करता रहा है। उसकी आधी जिंदगी, अंतरिक्ष में जो मनुष्य यात्रा करने जाएंगे उनको तकलीफ न हो, इसके लिए काम करने की रही है। सबसे बड़ी विचारणीय बात यही थी कि पृथ्वी को छोड़ते ही अंतरिक्ष में न मालूम कितने प्रभाव होंगे, न मालूम कितनी धाराएं होंगी रेडिएशन की, किरणों की--वे आदमी पर क्या प्रभाव करेंगी?

लेकिन दो हजार साल से ऐसा समझा जाता रहा है अरस्तू के बाद, पश्चिम में, कि अंतरिक्ष शून्य है, वहां कुछ है ही नहीं। दो सौ मील के बाद पृथ्वी पर हवाएं समाप्त हो जाती हैं, और फिर अंतरिक्ष शून्य है। लेकिन अंतरिक्ष यात्रियों की खोज ने सिद्ध किया कि वह बात गलत है। अंतरिक्ष शून्य नहीं है, बहुत भरा हुआ है। और न तो शून्य है, न मृत है; बहुत जीवंत है। सच तो यह है कि पृथ्वी की दो सौ मील की हवाओं की पर्तें सारे प्रभावों को हम तक आने से रोकती हैं। अंतरिक्ष में तो अदभुत प्रवाहों की धाराएं बहती रहती हैं। उनको आदमी सह पाएगा या नहीं?

तो आप जान कर हैरान होंगे और हंसेंगे भी कि आदमी को भेजने के पहले ब्राउन ने आलू भेजे अंतरिक्ष में। क्योंकि ब्राउन का कहना है कि आलू और आदमी में बहुत भीतरी फर्क नहीं है। अगर आलू सड़ जाएगा तो आदमी नहीं बच सकेगा; और अगर आलू बच सकता है तो ही आदमी बच सकेगा। आलू बहुत मजबूत प्राणी है। और आदमी तो बहुत संवेदनशील है। अगर आलू भी नहीं बच सकता अंतरिक्ष में और सड़ जाएगा तो आदमी के बचने का कोई उपाय नहीं है। अगर आलू लौट आता है जीवंत, मरता नहीं है, और उसे जमीन में बोने पर अंकुर निकल आता है, तो फिर आदमी को भेजा जा सकता है। तब भी डर है कि आदमी सह पाएगा या नहीं।
इससे एक और हैरानी की बात ब्राउन ने सिद्ध की कि आलू जमीन के भीतर पड़ा हुआ, या कोई भी बीज जमीन के भीतर पड़ा हुआ भी बढ़ता है सूरज के ही संबंध में! सूरज ही उसे जगाता, उठाता है। उसके अंकुर को पुकारता और ऊपर उठाता है।

Continued..

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 9

पापड़ और जलेबी 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

होटल में तीन दिन रुकने के बाद हम नए अपार्टमेंट में गए।। सामान पहुंचाते–पहुंचाते रात के एक बज गए। अपार्टमेंट में पार्किंग आरक्षित थी। मेरे पार्किंग लॉट में न जाने किस खबीस के बच्चे ने अपनी कार खड़ी कर रखी थी। मैने कुछ देर के लिए एक आरक्षित किंतु खाली पार्किंग लॉट हथिया लिया। अपार्टमेंट में समान रख कर वापस जा रहा था कि एक वृद्ध सज्जन अवतरित हुए। सीधे सवाल दागा कि क्या यह करोला तुम्हारी है। मैने बड़ी जल्दबाज़ी में लापरवाही से जवाब दिया कि मेरे पार्किंग लॉट में किसी ने हथिया रखा है अतः मैने दूसरे पार्किंग लॉट का प्रयोग कर लिया। वृद्ध सज्जन का अगला बाउंसर था, आपका पार्किंग लॉट हथिया लिया गया हो तो इसका यह मतलब नहीं कि आप भी किसी का पार्किंग लॉट हथिया लें। आप गेस्ट लॉट का प्रयोग कर सकते थे। जवाब बिलकुल वाजिब था। चांदनी रात में हैलोजेन की दूधिया रौशनी में भी मैं वृद्ध सज्जन के तमतमाए चेहरे की लाली देख सकता था। मैने सफाई दी कि जनाब कुछ देर के लिए सामान उतारने तक आपका लॉट प्रयोग किया था, मैं अभी ख़ाली करता हूं। लेकिन वे भद्र पुरुष 'कल से ध्यान रखना' की हिदायत देते हुए ओझल हो गए। बात आई गई हो गई।


डलास की धूप देखकर मेरी मेमसाहब की बांछें खिल गयीं। पूरे दो साल बाद पापड़ बनाने का स्वर्णिम अवसर जो उनके हाथ लगा था। शाम को आफिस से वापस आया तो डलास की धूप में सूखे पापड़ चाय के साथ हाज़िर थे। एक मज़ेदार प्रहसन हो गया उसके बाद। मेमसाहब ने बताया पापड़ बनाते समय नीचे की मंज़िल पर रहने वाला कोई अमरीकी उनका दोस्त बन गया है। अधेड़ उम्र का व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है और भारतीय भोजन का शौकीन है। उसने मेमसाहब को पापड़ बनाते देखकर पूछा होगा कि तुम क्या कर रही हो। मेमसाहब ने उसे पापड़ पुराण सुना दिया। बंदा पापड़ प्रेमी निकला। उसने मेमसाहब को आसपास के सारे भारतीय रेस्टोरेन्ट के नाम गिना डाले। साथ ही उन्हें यह भी सलाह दे डाली कि चूंकि तुम लोग नए हो अतः मैं तुम्हारे शौहर को आसपास की सभी ज़रूरी चीज़े पते ठिकाने बता दूंगा। हांलांकि उसने यह भी स्वीकार किया कि भारतीयों को यहां अपने सामाजिक कौशल के चलते स्थापित होने में ज्यादा कष्ट नहीं उठाना पड़ता। मेमसाहब ने घोषणा की कि छोले भटूरे बने हैं और मैं उनके नए दोस्त को भी कुछ छोले भटूरे दे आऊं। इसी बहाने किसी काम के आदमी से जान पहचान हो जाएगी। मेरे यह कहने पर कि यहां के लोग ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं करते मेमसाहब ने उनके मिलनसार एकाकी और अधेड़ होने की दुहाई दे डाली।


मैं तब भी अड़ा था कि यहां के लोग शायद ही हमारी तरह ताउम्र विवाहित रहते हैं। असुविधा की वजह से बच्चे न पाल कर कुत्ते बिल्ली पालते हैं और परिवार की जगह कार और मकान जैसी बेजान चीजा पर ज्यादा समय व ध्यान देते हैं। इसी वजह से अकेले रहते–रहते खड़ूस हो जाते हैं, पर मेरी संवेदनशील पत्नी अगर किसी का भला करने पर अड़ जाए तो सारे तर्क कुतर्क व्यर्थ हैं। वह सामाजिकता, संवेदनशीलता और धार्मिक परमार्थ आदि के इतने तर्क प्रस्तुत करेंगी कि उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। झख मार कर मैं छोले भटूरे की प्लेट लेकर नीचे वाले अपार्टमेंट में गया और घंटी बजाई। अपने इस नए पड़ोसी से मैने बताया कि मैं उनकी नयी पड़ोसन का पति हूं और उनके लिए मेरी पत्नी ने छोले भटूरे भेजे हैं। पड़ोसी ने मुझे अंदर आमंत्रित किया रोशनी में मेरे दीदार होते ही वे बोले, "मैं तुम्हें पहचानता हूं। हमारा पार्किंग लॉट में विवाद हो गया था पर अब उसे भूल जाओ।" जनाब का नाम बॉब था और वे फोर्ड कार की डीलरशिप में कार्यरत थे।


बॉब को भारतीय भोजन चटपटा होने की वजह से बहुत पसंद था। मुझे उसने एक पेंटिंग दिखाई जिसमें विश्व की सभी प्रकार की मिर्चों के चित्र थे। कुल छप्पन प्रकार की मिर्चों में वह बीस तरह की मिर्चें चख चुका था। बॉब पार्किंग लॉट वाला मामला जल्द ही भूल गया। उसने मुझे एक और तस्वीर दिखा कर उसमें से एक महिला को पहचानने को कहा। यह महिला और कोई नहीं बीस तीस महिलाओं के शिष्ट मंडल से घिरी स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी थीं। उस शिष्ट मंडल में बॉब की दादी भी शामिल थीं। बॉब ने बताया कि वह भारत घूमने जाना चाहता है। उसके पहले वह तैयारी कर रहा है और भारत के बारे में जो कुछ उसे मिला सब पढ़ चुका है।


एक दिन रविवार की सुबह बॉब आवाज़ लगा कर बुलाने लगा। पता चला जनाब अपने पिछवाड़े बार्बेक्यू स्टेक यानि कि भैंसे का मांस पका रहे थे। बोले कि तुम अक्सर भारतीय खाना खिलाते हो आज तुम्हें टेक्सास स्पेशल खिलाता हूं। यह पता चलने पर कि हम शाकाहारी हैं बेचारा बहुत निराश हुआ पर थोड़ी ही देर में कहीं से मैक्सिकन डिश लेकर हाज़िर हो गया। कभी कभी यह देख कर ताज्जुब होता है टेक्सास की बगल में बसे देश मैक्सिको निवासियों की शक्ल सूरत भारतीयों से इस कदर मिलती है कि धोखा हो जाता है।


जलेबी का जलवा


एक दिन शाम को आफिस से घर पहुंचा तो श्रीमती जी हांथ पर पड़ोसन से बरनॉल लगवा रही थीं। पता चला महिला मंडल में पकवान चर्चा के बीच जलेबी का ज़िक्र आगया। सबको एक ही कोफ्त थी कि डलास में सब मिलता है पर किसी को जलेबी नहीं दिखी। एक दक्षिण भारतीय पड़ोसन तो कभी जलेबी नाम की चीज़ से रूबरू ही नहीं हुई थी। मेरी पाक कला सिद्धस्त श्रीमती जी मोर्चे पर कूद पड़ीं। आखिर कानपुर और जलेबी की प्रतिष्ठा का प्रश्न था पर आपाधापी में गर्म तेल मैडम के हाथ पर छलक गया। उनकी प्राथमिक चिकित्सा के बीच मेरा पदार्पण हुआ। फौरन एक 'वॉकइन क्लीनिक' ले गया। डाक्टर ने मरहम पट्टी तो कर दी पर उसे यह चोट कुकिंग में लगी है यह हजम नहीं हो रहा था। वह शंकित था कि कहीं चोट की वजह मियां बीवी में हाथापाई तो नहीं। अब शक की दवा तो हकी लुक्मान के पास भी नहीं थी। पर बुढऊ डाक्टर कुछ देर में समझ गया कि इस दुर्घटना के पहले हम दोनों में सिर फुटव्वल जैसा कुछ नहीं हुआ।

 

Go Back

Critical Assessment of Astrology -2

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश -2)

 


सूरज, जैसा हम साधारणतः सोचते हैं, ऐसा कोई निष्क्रिय अग्नि का गोला नहीं है, अत्यंत सक्रिय है। और प्रतिपल सूरज की तरंगों में रूपांतरण होते रहते हैं। और सूरज की तरंगों का जरा सा रूपांतरण भी पृथ्वी के प्राणों को कंपित करता है। इस पृथ्वी पर कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता जो सूरज पर घटित हुए बिना घटित हो जाता हो। जब सूर्य का ग्रहण होता है तो पक्षी जंगलों में गीत गाना चौबीस घंटे पहले से बंद कर देते हैं। पूरे ग्रहण के समय तो सारी पृथ्वी मौन हो जाती है, पक्षी गीत गाना बंद कर देते हैं, सारे जंगलों के जानवर भयभीत हो जाते हैं, किसी बड़ी आशंका से पीड़ित हो जाते हैं। बंदर वृक्षों को छोड़ कर नीचे आ जाते हैं। भीड़ लगा कर किसी सुरक्षा का उपाय करने लगते हैं। और एक आश्चर्य कि बंदर, जो निरंतर बातचीत और शोरगुल में लगे रहते हैं, सूर्यग्रहण के वक्त बंदर इतने मौन हो जाते हैं जितने साधु और संन्यासी भी नहीं होते!


चीजेवस्की ने ये सारी की सारी बातें स्थापित की हैं। सुमेर में सबसे पहले यह खयाल पैदा हुआ। उसके बाद स्विस पैरासेलीसस नाम का एक चिकित्सक, उसने एक बहुत अनूठी मान्यता स्थापित की। और वह मान्यता आज नहीं कल सारे मेडिकल साइंस को बदलने वाली सिद्ध होगी। अब तक उस मान्यता पर बहुत जोर नहीं दिया जा सका, क्योंकि ज्योतिष तिरस्कृत विषय है--सर्वाधिक पुराना, लेकिन सर्वाधिक तिरस्कृत, यद्यपि सर्वाधिक मान्य भी।

 

अभी फ्रांस में पिछले वर्ष गणना की गई तो सैंतालीस प्रतिशत लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं कि वह विज्ञान है--फ्रांस में! अमरीका में मौजूद पांच हजार बड़े ज्योतिषी दिन-रात काम में लगे रहते हैं और उनके पास इतने कस्टमर्स हैं कि वे काम निपटा नहीं पाते। करोड़ों डालर अमरीका प्रतिवर्ष ज्योतिषियों को चुकाता है। अंदाज है कि सारी पृथ्वी पर कोई अठहत्तर प्रतिशत लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं। लेकिन वे अठहत्तर प्रतिशत लोग सामान्य हैं। वैज्ञानिक, विचारक, बुद्धिवादी ज्योतिष की बात सुन कर ही चौंक जाते हैं।


सी जी जुंग ने कहा है कि तीन सौ वर्षों से विश्वविद्यालयों के द्वार ज्योतिष के लिए बंद हैं, यद्यपि आने वाले तीस वर्षों में ज्योतिष तुम्हारे दरवाजों को तोड़ कर विश्वविद्यालयों में पुनः प्रवेश पाकर रहेगा। पाकर रहेगा प्रवेश इसलिए कि ज्योतिष के संबंध में जो-जो दावे किए गए थे उनको अब तक सिद्ध करने का उपाय नहीं था, लेकिन अब उनको सिद्ध करने का उपाय है।

 

पैरासेलीसस ने एक मान्यता को गति दी और वह मान्यता यह थी कि आदमी तभी बीमार होता है जब उसके और उसके जन्म के साथ जुड़े हुए नक्षत्रों के बीच का तारतम्य टूट जाता है। इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है। उससे बहुत पहले पाइथागोरस ने यूनान में, कोई ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व, यानी आज से कोई पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व पाइथागोरस ने प्लेनेटरी हार्मनी, ग्रहों के बीच एक संगीत का संबंध है, इसके संबंध में एक बहुत बड़े दर्शन को जन्म दिया था।

और पाइथागोरस ने जब यह बात कही थी तब वह भारत और इजिप्ट इन दो मुल्कों की यात्रा करके वापस लौटा था। और पाइथागोरस जब भारत आया तब भारत बुद्ध और महावीर के विचारों से तीव्रता से आप्लावित था। पाइथागोरस हिंदुस्तान से वापस लौट कर जो बातें कहा है उसमें उसने महावीर और विशेषकर जैनों के संबंध में बहुत सी बातें महत्वपूर्ण कही हैं। उसने जैनों को जैनोसोफिस्ट कह कर पुकारा है। सोफिस्ट का मतलब होता है दार्शनिक और जैनो का मतलब तो जैन! तो जैन दार्शनिक को पाइथागोरस ने जैनोसोफिस्ट कहा है। नग्न रहते हैं, यह सारी बात की है।

पाइथागोरस मानता था कि प्रत्येक नक्षत्र या प्रत्येक ग्रह या उपग्रह जब यात्रा करता है अंतरिक्ष में, तो उसकी यात्रा के कारण एक विशेष ध्वनि पैदा होती है। प्रत्येक नक्षत्र की गति एक विशेष ध्वनि पैदा करती है। और प्रत्येक नक्षत्र की अपनी व्यक्तिगत निजी ध्वनि है। और इन सारे नक्षत्रों की ध्वनियों का एक तालमेल है, जिसे वह विश्व की संगीतबद्धता, हार्मनी कहता था। जब कोई मनुष्य जन्म लेता है तब उस जन्म के क्षण में इन नक्षत्रों के बीच जो संगीत की व्यवस्था होती है वह उस मनुष्य के प्राथमिक, सरलतम, संवेदनशील चित्त पर अंकित हो जाती है। वही उसे जीवन भर स्वस्थ और अस्वस्थ करती है। जब भी वह अपनी उस मौलिक जन्म के साथ पाई गई संगीत-व्यवस्था के साथ तालमेल बना लेता है तो स्वस्थ हो जाता है। और जब उसका तालमेल छूट जाता है तो अस्वस्थ हो जाता है।

पैरासेलीसस ने इस संबंध में बड़ा महत्वपूर्ण काम किया। वह किसी मरीज को दवा नहीं देता था जब तक उसकी जन्मकुंडली न देख ले। और बड़ी हैरानी की बात है कि पैरासेलीसस ने जन्मकुंडलियां देख कर ऐसे मरीजों को ठीक किया जिनको कि चिकित्सक कठिनाई में पड़ गए थे और ठीक नहीं कर पाते थे। उसका कहना था, जब तक मैं यह न जान लूं कि यह व्यक्ति किन नक्षत्रों की स्थिति में पैदा हुआ है तब तक इसके अंतर्संगीत के सूत्र को भी पकड़ना संभव नहीं है। और जब तक मैं यह न जान लूं कि इसके अंतर्संगीत की व्यवस्था क्या है तो इसे कैसे हम स्वस्थ करें? क्योंकि स्वास्थ्य का क्या अर्थ है, इसे थोड़ा समझ लें!

अगर साधारणतः हम चिकित्सक से पूछें कि स्वास्थ्य का क्या अर्थ है तो वह इतना ही कहेगा: बीमारी का न होना। पर उसकी परिभाषा निगेटिव है, नकारात्मक है। और यह दुखद बात है कि स्वास्थ्य की परिभाषा हमें बीमारी से करनी पड़े। स्वास्थ्य तो पाजिटिव चीज है, बीमारी निगेटिव है, नकारात्मक है। स्वास्थ्य तो स्वभाव है, बीमारी तो आक्रमण है। तो स्वास्थ्य की परिभाषा हमें बीमारी से करनी पड़े, यह बात अजीब है। घर में रहने वाले की परिभाषा मेहमान से करनी पड़े, तो बात अजीब है। स्वास्थ्य तो हमारे साथ है, बीमारी कभी होती है। स्वास्थ्य तो हम लेकर पैदा होते हैं, बीमारी उस पर आती है। पर हम स्वास्थ्य की परिभाषा अगर चिकित्सकों से पूछें तो वे यही कह पाते हैं कि बीमारी नहीं है तो स्वस्थ हैं।


पैरासेलीसस कहता था, यह व्याख्या गलत है। स्वास्थ्य की पाजिटिव डेफिनीशन होनी चाहिए। पर उस पाजिटिव डेफिनीशन को, उस विधायक व्याख्या को कहां से पकड़ेंगे? तो पैरासेलीसस कहता था, जब तक हम तुम्हारे अंतर्निहित संगीत को न जान लें--वही तुम्हारा स्वास्थ्य है--तब तक हम ज्यादा से ज्यादा तुम्हारी बीमारियों से तुम्हारा छुटकारा करवा सकते हैं। लेकिन हम एक बीमारी से तुम्हें छुड़ाएंगे और तुम दूसरी बीमारी को तत्काल पकड़ लोगे। क्योंकि तुम्हारे भीतरी संगीत के संबंध में कुछ भी नहीं किया जा सका। असली बात तो वही थी कि तुम्हारा भीतरी संगीत स्थापित हो जाए।

 Contd..

Go Back

Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 8

 

तबादला डलास के लिए  

 

एक दिन सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी। सीधी साधी भाषा में मतलब यह था कि उन्हें अब मेरी ज़रूरत नहीं थी। और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया। जैसा कि पहले भी बता चुका हूं कि तेज़ी से बदलती तकनीक वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दो चार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना होता है। इन सबके साथ जुड़ी है स्थानांतर की चिर समस्या। यानि कि नए प्रांत में नया रहने का ठिकाना, सामान और कार का स्थानांतरण फिर घर का पता, टेलीफोन, बैंक इत्यादि सेवाओं को नए स्थान परिवर्तन से सूचित कराने की जद्दोजहद। ख़ैर बेंच पर आने का पहला सोमवार था। मार्च की गुनगुनी धूप सनरूम में आ रही थी और मैं नया कुछ तकनीकी मसला पढ़ रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बजी। यह मामू का फोन था। मामू शब्द कंप्यूटर प्रोगरामों ने बिचौलियों के लिए ईजाद कर रखा है। पता चला कि दो घंटे में कोई जनाब इंटरव्यू के लिए फोन करेंगे। फोन आया और सिर्फ यह पूछने के बाद कि मैने कौन–कौन सी विधाओं में काम कर रखा है डलास निवासी साक्षात्कार कर्ता ने निमंत्रण भेज दिया कि भाई आ जाओ डलास में बसने।

 

 

 

दीवानी दुनिया डलास की 

 

अटलांटा से डलास कार यात्रा की ठानी थी। 800 मील यानि लगभग 1300 किलोमीटर का यह रास्ता एकदम सीधा एक हाइवे अटलांटा से शुरू होकर डलास पहुंचता है। हिन्दुस्तान में मात्र दो दिन में 105–130 किलो मीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से 1300 किलोमीटर सफर तय करने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचा था। थोड़ी थोड़ी दूर पर रेस्टोरेन्ट, विश्रामगृह, पेट्रोल पंप वगैरह होने और उत्तम कोटि की सड़क ने सफ़र को कष्ट रहित बना दिया। जार्जिया से एलाबामा, मिसौरी एवं लुसियाना होते हुए टेक्सास में दाखिल हुए। पूरा रास्ता दो गलियों का था। सफर मस्ती से कटता रहा। टेक्सास में दाख़िल होते ही प्रांत के स्वागत– पट ने टेक्सास के अक्खड़पन से रूबरू कराया। जहां सारे प्रांत के स्वागत 'वेलकम टु स्टेट' से शुरू होते हैं वहीं टक्सास की बानगी देखिए— 'डू नॉट मेस विद टेक्सास'। जहां तक नज़र जा सकती थी, खेत दिखते थे। कहीं कहीं काउबॉय चरवाहे बाल गोपाल घोड़े पर सवार गाय भैंसों को इकठ्ठा कर रहे थे।


अमरीका के सर्वाधिक क्षेत्र में बसा टेक्सास प्रांत में जहां तक नज़र जा सकती है सपाट ज़मीन दिखती है। मैं हाईवे पर बने स्वागत कक्ष में रुका। सड़क मार्ग के आगंतुकों के लिए सभी प्रांतों में स्वागत केंद्र बने हैं— मुफ्त नक्शे, होटल व रेस्टोरेंट की तालिका, पर्यटन स्थलों की सचित्र जानकारी और सहायता के लिए कुछ कर्मचारी। स्वागत केंद्र के कर्मचारियों ने मुझे डलास तक का रास्ता समझा दिया। कुछ ही घंटों के बाद अपनी मंज़िल डलास डाउन टाउन की खूबसूरत 'स्काईलाइन' दूर से दिखने लगा। अमरीका में गगन चुंबी इमारतों का झुंड 'स्काईलाइन' के नाम से जाना जाता है। और इस शहर की समृद्धि का परिचायक है। हांलांकि हम इसे कंकरीट के जंगल नाम से भी जानते हैं। फिर छे लेन वाले हाई वे से सामना हुआ और कुछ ही देर में मैं अपने होटल में था। स्वागत कर्मचारी ने बताया कोई रवि आपके बगल वाले कमरे में इंतज़ार कर रहे हैं। मैं सोच रहा था, डलास में मैं भला किस रवि को जानता हूं। कमरा खुलवाने पर दार जी रविंदर भाई निकले। दार जी एक हफ्ते पहले ही दिल्ली से आकाशवाणी को तलाक देकर आए थे।

पंजाब दा पुत्तर


होटल में एकाध घंटे बाद याद आया कि पीजी भाई ने किसी बृज का फोन नंबर दिया था। फोन पर बात करने के आधा घंटे बाद बृजमोहन जी रात्रिभोज के निमंत्रण के साथ हाज़िर थे। ऐसी ज़िंदादिली कम ही भारतीयों में देखने को मिलती है। बृजभाई के साथ डलास में रंग जम गया या फिर उन्हीं की भाषा में नज़ारा आ गया। बृज और दार जी दोनों तंदूरी चिकन के शौकीन थे और होटल में गुलाबी चिकन के साथ दोनों की मीठी पंजाबी बातें, जो ईमानदारी से मेरे 50 प्रतिशत ही पल्ले पड़ती थीं, कानों को बड़ी भाती थीं।


बृज के पास माजदा कार थी दमदार इंजन वाली। माजदा के डैशबोर्ड पर उसने शंकर जी की मूर्ति स्थापित कर रखी थी। बृज भाई ड्राइवर तो उम्दा किस्म के थे पर जब कभी तरन्नुम में गाड़ी चलाते तो ख़ता कर बैठते। अमेरिकी सड़कों पर गल्ती अक्सर महंगी ही पड़ती है। बृज भाई जब भी किसी ऐसी स्थिति से दोचार होने से बचते तो तुरंत शंकर जी के चरण स्पर्श कर के कहते आज तो परम पिता परमात्मा ने बचा लिया। शंकर जी भी सोचते होंगे कि भक्त ने एक तो गाड़ी में उल्टा मुंह कर के बैठाला है, अक्सर तेज़ कार चलाता है और हर ऊलजलूल गल्ती से बचाने का ठेका भी मुझे ही दे रखा है।


एक बार तो शंकर जी ने बहुत बचाया वर्ना हम दोनों को बड़े बेभाव की पड़ती। मैं और बृज एक साथ उसकी कार में जा रहे थे। बृज भाई मस्त मूड में थे बोले कि महाराज मुझे यहां रहते तीन साल हो गए अब तो रास्ते इतने याद हो गए हैं कि आंख मूंद कर भी मंजिल तक पहुंच सकता हूं। यह कहते हुए बृज भाई एक लेन में मुड़े। हम दोनो यह देख कर भौचक्के रह गए कि एक कार तेज़ी से हमारी ही लेन में आ रही है। बृजभाई ने हार्न मारा तो वह चालक उल्टे चोर की तरह हम कोतवालों को डांटते यानि कि हार्न मारते हुए चला गया। पर यह क्या अब तो दोनों लेन में कारें अपनी ही दिशा में आरहीं थीं।

बृज भाई बोले महाराज आज क्या पूरे शहर ने पी रखी है? अब तक मुझे माजरा समझ में आ गया था। ग़फ़लत में हम एक एग्ज़िट रैप में उल्टी दिशा से जा घुसे थे। अब हम दोनों को काटो तो खून नहीं कि गाड़ी को यू टर्न कैसे लगाएं। जब दोनों ही लेन में गाड़िया अपनी तरफ़ मरखने बैल के मानिंद दौड़ती हुई आ रही हैं। मेने बृजभाई से हार्न बजाते रहने को कहा, ताकि दूसरी दिशा वाले सावधान रहें कि हम ग़लत दिशा में हैं। तभी एक पुलिस कार हमारी लेन में आई। हमारी कुछ जान में जान आई। पुलिस वाले ने आकर पहला सवाल् किया हम ग़लत दिशा में कैसे आ गए। बृजभाई ने मासूमियत से जवाब दिया कि हम इस इलाके में नए हैं। रास्ता भूलकर ग़लत लेन में आ गए। अब यू टर्न लगाना मुश्किल लग रहा है। पुलिस वाले ने लाइसेंस वगैरह की जांच पड़ताल के बाद एक और पुलिस वाले की मदद से दोनों लेन बंद कर हमारी कार को यू टर्न में मदद दी। और साथ ही भविष्य में सजग रहने की ताकीद भी की। पुलिस वाले ने हमारी और दूसरी कारों के हार्न की जवाबी कव्वाली सुनकर और हमारी कार दूर से ग़लत दिशा में खड़ी देख कर समझा कि कोई शराबी ग़लत लेन में जा घुसा है। इसलिए वह मसला हल करने आ गया था। पर यहां मामला अपने ही शहर में नए होने का था।

 Contd..

 

 

Go Back

Critical Assessment of Astrology -1

ज्योतिष कितना सच और कितना झूठ (ओशो रजनीश -1)

 

हम में से अनेक लोग अपना काफ़ी समय ज्योतिष के सही या गलत होने की सतही बहस पर गुज़ार देते हैं , पर कभी उसकी गहराई में जाने की कोशिश नहीं करते हैं । इस धारावहिक की हरेक कड़ी में समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों की ज्योतिष के बारे में राय प्रस्तुत की जा रही है । पहली कड़ी में ओशो रजनीश के विचार जानिए ज्योतिष पर ...

  

ज्योतिष शायद सबसे पुराना विषय है और एक अर्थ में सबसे ज्यादा तिरस्कृत विषय भी है। सबसे पुराना इसलिए कि मनुष्य-जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी है उसमें ज्योतिष, ऐसा कोई भी समय नहीं था, जब मौजूद न रहा हो। जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हड्डी के अवशेषों पर ज्योतिष के चिह्न अंकित हैं। पश्चिम में पुरानी से पुरानी जो खोजबीन हुई है, वह जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व इन हड्डियों की है, जिन पर ज्योतिष के चिह्न और चंद्र की यात्रा के चिह्न अंकित हैं। लेकिन भारत में तो बात और भी पुरानी है।

ऋग्वेद में, पंचानबे हजार वर्ष पूर्व ग्रह-नक्षत्रों की जैसी स्थिति थी, उसका उल्लेख है। इसी आधार पर लोकमान्य तिलक ने यह तय किया था कि ज्योतिष नब्बे हजार वर्ष से ज्यादा पुराने तो निश्चित ही होने चाहिए। क्योंकि वेद में यदि पंचानबे हजार वर्ष पहले जैसी नक्षत्रों की स्थिति थी उसका उल्लेख है, तो वह उल्लेख इतना पुराना तो होगा ही। क्योंकि उस समय जो स्थिति थी नक्षत्रों की उसे बाद में जानने का कोई भी उपाय नहीं था। अब हमारे पास ऐसे वैज्ञानिक साधन उपलब्ध हो सके हैं कि हम जान सकें अतीत में कि नक्षत्रों की स्थिति कब कैसी रही होगी।

ज्योतिष की सर्वाधिक गहरी मान्यताएं भारत में पैदा हुईं। सच तो यह है कि ज्योतिष के कारण ही गणित का जन्म हुआ। ज्योतिष की गणना के लिए ही सबसे पहले गणित का जन्म हुआ। और इसीलिए अंकगणित के जो अंक हैं वे भारतीय हैं, सारी दुनिया की भाषाओं में। एक से लेकर नौ तक जो गणना के अंक हैं, वे समस्त भाषाओं में जगत की, भारतीय हैं। और सारी दुनिया में नौ डिजिट, नौ अंक स्वीकृत हो गए, उसका भी कुल कारण इतना है कि वे नौ अंक भारत में पैदा हुए और धीरे-धीरे सारे जगत में फैल गए।


जिसे आप अंग्रेजी में नाइन कहते हैं वह संस्कृत के नौ का ही रूपांतरण है। जिसे आप एट कहते हैं वह संस्कृत के अष्ट का ही रूपांतरण है। एक से लेकर नौ तक जगत की समस्त सभ्य भाषाओं में गणित के जो अंकों का प्रचलन है वह भारतीय ज्योतिष के प्रभाव में हुआ।

भारत से ज्योतिष की पहली किरणें सुमेर की सभ्यता में पहुंचीं। सुमेरियंस ने सबसे पहले, ईसा से छह हजार वर्ष पूर्व, पश्चिम के जगत के लिए ज्योतिष का द्वार खोला। सुमेरियंस ने सबसे पहले नक्षत्रों के वैज्ञानिक अध्ययन की आधारशिलाएं रखीं। उन्होंने बड़े ऊंचे, सात सौ फीट ऊंचे मीनार बनाए। और उन मीनारों पर सुमेरियन पुरोहित चौबीस घंटे आकाश का अध्ययन करते थे--दो कारणों से। एक तो सुमेरियंस को इस गहरे सूत्र का पता चल गया था कि मनुष्य के जगत में जो भी घटित होता है, उस घटना का प्रारंभिक स्रोत नक्षत्रों से किसी न किसी भांति संबंधित है।


जीसस से छह हजार वर्ष पहले सुमेरियंस की यह धारणा कि पृथ्वी पर जो भी बीमारी पैदा होती है, जो भी महामारी पैदा होती है, वह सब नक्षत्रों से संबंधित है। अब तो इसके लिए वैज्ञानिक आधार मिल गए हैं। और जो लोग आज के विज्ञान को समझते हैं वे कहते हैं सुमेरियंस ने मनुष्य-जाति का असली इतिहास प्रारंभ किया। इतिहासज्ञ कहते हैं कि सब तरह का इतिहास सुमेर से शुरू होता है।

उन्नीस सौ बीस में चीजेवस्की नाम के एक रूसी वैज्ञानिक ने इस बात की खोजबीन की कि जब भी सूरज पर--सूरज पर हर ग्यारह वर्षों में पीरियाडिकली बहुत बड़ा विस्फोट होता है। सूर्य पर हर ग्यारह वर्ष में आणविक विस्फोट होता है। और चीजेवस्की ने यह खोजबीन की कि जब भी सूरज पर ग्यारह वर्षों में आणविक विस्फोट होता है तभी पृथ्वी पर युद्ध और क्रांतियों के सूत्रपात होते हैं। और उसने कोई सात सौ वर्ष के लंबे इतिहास में सूर्य पर जब भी दुर्घटना घटती है, तभी पृथ्वी पर दुर्घटना घटती है, इसका इतना वैज्ञानिक विश्लेषण किया कि स्टैलिन ने उसे उन्नीस सौ बीस में उठा कर जेल में डाल दिया। वह स्टैलिन के मरने के बाद ही चीजेवस्की छूट सका। क्योंकि स्टैलिन के लिए तो अजीब बात हो गई! माक्र्स का और कम्युनिस्टों का खयाल है कि पृथ्वी पर जो क्रांतियां होती हैं उनका कारण मनुष्य के बीच आर्थिक वैभिन्य है। और चीजेवस्की कहता है कि क्रांतियों का कारण सूरज पर हुए विस्फोट हैं।

 

अब सूरज पर हुए विस्फोट और मनुष्य के जीवन की गरीबी और अमीरी का क्या संबंध? अगर चीजेवस्की ठीक कहता है तो माक्र्स की सारी की सारी व्याख्या मिट्टी में चली जाती है। तब क्रांतियों का कारण वर्गीय नहीं रह जाता, तब क्रांतियों का कारण ज्योतिषीय हो जाता है। चीजेवस्की को गलत तो सिद्ध नहीं किया जा सका, क्योंकि सात सौ साल की जो गणना उसने दी थी वह इतनी वैज्ञानिक थी और सूरज में हुए विस्फोटों के साथ इतना गहरा संबंध उसने पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं का स्थापित किया था कि उसे गलत सिद्ध करना तो कठिन था। लेकिन उसे साइबेरिया में डाल देना आसान था।

 

स्टैलिन के मर जाने के बाद ही चीजेवस्की को ख्रुश्चेव साइबेरिया से मुक्त कर पाया। इस आदमी के जीवन के कीमती पचास साल साइबेरिया में नष्ट हुए। छूटने के बाद भी वह चार-छह महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह सका। लेकिन छह महीने में भी वह अपनी स्थापना के लिए और नये प्रमाण इकट्ठे कर गया है। पृथ्वी पर जितनी महामारियां फैलती हैं, उन सबका संबंध भी वह सूरज से जोड़ गया है।

Continued..

Go Back

20 Blog Posts